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चैत्र नवरात्रि 2027 कब है ? घट स्थापना मुहूर्त एवं पूजा विधि

चैत्र नवरात्रि 2027 कब है जानें घट स्थापना-मुहूर्त एवं पूजन विधि

चैत्र नवरात्रि हिंदू धर्म का एक पवित्र पर्व है। यह मां दुर्गा की उपासना को समर्पित है। नौ दिनों तक माता के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। भक्त व्रत रखते हैं और माता रानी से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। चैत्र नवरात्रि को वासंतिक नवरात्रि भी कहा जाता है। इसी दिन से हिंदू नववर्ष का आरंभ होता है। नवरात्रि के नौवें दिन राम नवमी मनाई जाती है। इस दिन भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव मनाया जाता है।

वर्ष 2027 में चैत्र नवरात्रि 7 अप्रैल, बुधवार से शुरू होगी। इस दिन घट स्थापना के साथ मां दुर्गा की पूजा आरंभ होगी। आइए जानते हैं चैत्र नवरात्रि 2027 की तारीख, घट स्थापना शुभ मुहूर्त, पूजा सामग्री और संपूर्ण पूजन विधि।

चैत्र नवरात्रि 2027 कब है ?

वर्ष 2027 में चैत्र नवरात्रि का आरंभ 7 अप्रैल, बुधवार से होगा। इस दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि है। नवरात्रि का समापन 15 अप्रैल, गुरुवार को राम नवमी के साथ होगा।

मां दुर्गा पूजन शुभ मुहूर्त एवं घट स्थापना मूहूर्त

घट स्थापना तिथि: 7 अप्रैल 2027, बुधवार

घट स्थापना मुहूर्त: सुबह 6:05 बजे से 7:26 बजे तक (नई दिल्ली के अनुसार)।

प्रतिपदा तिथि प्रारंभ: 7 अप्रैल 2027, सुबह 5:20 बजे।

प्रतिपदा तिथि समाप्त: 8 अप्रैल 2027, सुबह 4:28 बजे।

समय स्थान के अनुसार बदल सकता है। अपने शहर के पंचांग से स्थानीय मुहूर्त अवश्य जांचें।

चैत्र नवरात्रि 2027 की महत्वपूर्ण तारीखें

विवरण तारीख दिन
नवरात्रि प्रारंभ एवं घट स्थापना 7 अप्रैल 2027 बुधवार
मां ब्रह्मचारिणी पूजा 8 अप्रैल 2027 गुरुवार
मां चंद्रघंटा पूजा 9 अप्रैल 2027 शुक्रवार
मां कूष्मांडा पूजा 10 अप्रैल 2027 शनिवार
मां स्कंदमाता पूजा 11 अप्रैल 2027 रविवार
मां कात्यायनी पूजा 12 अप्रैल 2027 सोमवार
मां कालरात्रि पूजा 13 अप्रैल 2027 मंगलवार
दुर्गा अष्टमी, मां महागौरी पूजा 14 अप्रैल 2027 बुधवार
राम नवमी, मां सिद्धिदात्री पूजा 15 अप्रैल 2027 गुरुवार

घट स्थापना एवं मां दुर्गा पूजन का महत्व

नवरात्रि में घट स्थापना का बहुत महत्व होता है। कलश को सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य देने वाला तथा मंगलकारी माना जाता है। कलश के मुख में भगवान विष्णु, गले में रुद्र, मूल में ब्रह्मा तथा मध्य में देवी शक्ति का निवास माना जाता है।

Navratri के समय ब्रह्मांड में उपस्थित शक्तियों का घट में आह्वान करके उसे कार्यरत किया जाता है। मान्यता है कि इससे घर की विपदादायक तरंगें नष्ट होती हैं। घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।

नवरात्रि की पहली तिथि पर भक्त अपने घर के मंदिर में कलश स्थापना करते हैं। इस स्थापना की एक विशेष विधि और शुभ मुहूर्त होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा स्वयं सिद्ध साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक मानी जाती है। इसलिए इस दिन शुभ कार्यों के लिए विशेष मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं मानी जाती। फिर भी संभव हो तो घट स्थापना शुभ मुहूर्त में ही करें।

घट स्थापना एवं दुर्गा पूजन की सामग्री

  • जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र। इसे वेदी कहते हैं।
  • जौ बोने के लिए शुद्ध और साफ मिट्टी। इसमें कंकड़ आदि नहीं होने चाहिए।
  • पात्र में बोने के लिए जौ। गेहूं भी ले सकते हैं।
  • घट स्थापना के लिए मिट्टी का कलश। सोने, चांदी या तांबे का कलश भी ले सकते हैं।
  • कलश में भरने के लिए शुद्ध जल।
  • नर्मदा जल, गंगाजल या अन्य साफ जल।
  • रोली और मौली।
  • इत्र, साबुत सुपारी, दूर्वा और कलश में रखने के लिए सिक्का।
  • पंचरत्न: हीरा, नीलम, पन्ना, माणक और मोती।
  • पीपल, बरगद, जामुन, अशोक और आम के पत्ते। सभी न मिलें तो कोई भी दो प्रकार के पत्ते ले सकते हैं।
  • कलश ढकने के लिए मिट्टी या तांबे का ढक्कन।
  • ढक्कन में रखने के लिए साबुत चावल।
  • नारियल, लाल कपड़ा, फूल-माला, फल और मिठाई।
  • दीपक, धूप और अगरबत्ती।

भगवती मंडल स्थापना विधि

जिस जगह पूजन करना है, उसे एक दिन पहले ही साफ-सुथरा कर लें। गौमूत्र और गंगाजल का छिड़काव करके स्थान पवित्र करें। सबसे पहले गौरी-गणेश जी का पूजन करें।

भगवती का चित्र बीच में स्थापित करें। उनके दाहिनी ओर हनुमान जी और बाईं ओर बटुक भैरव को स्थापित करें। भैरव जी के सामने शिवलिंग रखें। हनुमान जी के बगल में रामदरबार या लक्ष्मीनारायण को रखें। गौरी-गणेश को चावल के पुंज पर भगवती के समक्ष स्थान दें।

पूजा मंडल की स्थापना अपनी परंपरा और उपलब्ध स्थान के अनुसार करें। सभी देवी-देवताओं का श्रद्धापूर्वक पूजन करें।

दुर्गा पूजन सामग्री

पंचमेवा, पंचमिठाई, रूई, कलावा, रोली, सिंदूर, अक्षत, लाल वस्त्र, फूल, 5 सुपारी, लौंग, 5 पान के पत्ते, घी, कलश, कलश हेतु आम का पल्लव, चौकी, समिधा, हवन कुंड, हवन सामग्री, कमलगट्टे, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शर्करा), फल, बताशे, मिठाइयां, पूजा में बैठने हेतु आसन, हल्दी की गांठ, अगरबत्ती, कुमकुम, इत्र, दीपक, आरती की थाली, कुशा, रक्त चंदन, श्रीखंड चंदन, जौ, तिल, मां की प्रतिमा, आभूषण और श्रृंगार का सामान तथा फूल-माला।

गणपति पूजन विधि

किसी भी पूजा में सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा की जाती है। हाथ में पुष्प लेकर गणपति का ध्यान करें।

ध्यान मंत्र:

गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्।
उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्॥

आवाहन: हाथ में अक्षत लेकर बोलें:

आगच्छ देव देवेश, गौरीपुत्र विनायक।
तवपूजा करोमद्य, अत्रतिष्ठ परमेश्वर॥

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः। इहागच्छ इह तिष्ठ कहकर अक्षत गणेश जी पर चढ़ा दें।

आसन: हाथ में फूल लेकर बोलें:

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः आसनं समर्पयामि।

अर्घ्य: अर्घ्य पात्र में जल लेकर बोलें:

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः अर्घ्यं समर्पयामि।

आचमनीय-स्नानीय:

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः आचमनीयं समर्पयामि।

वस्त्र:

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः वस्त्रं समर्पयामि।

यज्ञोपवीत:

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि।

पुनराचमनीयम्: दोबारा पात्र में जल छोड़ें।

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः।

रक्त चंदन: रक्त चंदन लगाते हुए बोलें:

इदम् रक्त चंदनम् लेपनम्। ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः।

इसी प्रकार श्रीखंड चंदन बोलकर श्रीखंड चंदन लगाएं।

सिंदूर:

इदं सिन्दूराभरणं लेपनम्। ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः।

दूर्वा और बिल्वपत्र भी गणेश जी को चढ़ाएं।

नैवेद्य: गणेश जी को प्रसाद अर्पित करें।

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः इदं नानाविधि नैवेद्यानि समर्पयामि।

मिष्ठान अर्पण मंत्र:

शर्करा खण्ड खाद्यानि दधि क्षीर घृतानि च।
आहारो भक्ष्य भोज्यं गृह्यतां गणनायक॥

प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन कराएं।

इदं आचमनीयं। ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः।

तांबूल:

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः ताम्बूलं समर्पयामि।

फल:

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः फलं समर्पयामि।

दक्षिणा:

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः द्रव्य दक्षिणां समर्पयामि।

अब विषम संख्या में दीपक जलाकर निराजन करें और भगवान की आरती गाएं। हाथ में फूल लेकर गणेश जी को अर्पित करें। फिर तीन प्रदक्षिणा करें। इसी प्रकार अन्य सभी देवताओं की पूजा करें। जिस देवता की पूजा करनी हो, गणेश जी के स्थान पर उस देवता का नाम लें।

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घट स्थापना एवं दुर्गा पूजन की विधि

सबसे पहले जौ बोने के लिए एक ऐसा पात्र लें, जिसमें कलश रखने के बाद भी आसपास जगह रहे। मिट्टी की थाली जैसा पात्र हो तो श्रेष्ठ माना जाता है। इस पात्र में जौ उगाने के लिए मिट्टी की एक परत बिछा दें। मिट्टी शुद्ध होनी चाहिए। पात्र के बीच में कलश रखने की जगह छोड़ दें।

अब बीज डालें और फिर मिट्टी की एक परत बिछाएं। एक बार फिर जौ डालें। इसके ऊपर मिट्टी की परत बिछाएं। अब इस पर जल का छिड़काव करें।

कलश तैयार करें। कलश पर स्वस्तिक बनाएं। कलश के गले में मौली बांधें। अब कलश को थोड़े गंगाजल और शुद्ध जल से भर दें। कलश में साबुत सुपारी, फूल और दूर्वा डालें। इसमें इत्र, पंचरत्न और सिक्का डालें।

अब कलश में पांचों प्रकार के पत्ते डालें। कुछ पत्ते बाहर दिखाई देने चाहिए। चारों तरफ पत्ते लगाकर ढक्कन लगा दें। इस ढक्कन में अक्षत यानी साबुत चावल भर दें।

नारियल तैयार करें। नारियल को लाल कपड़े में लपेटकर मौली बांध दें। इस नारियल को कलश पर रखें। नारियल का मुख किस दिशा में रखना चाहिए, इसे लेकर अलग-अलग क्षेत्रीय मान्यताएं हैं। अपनी कुल परंपरा के अनुसार नारियल स्थापित करें।

अब इस कलश को जौ उगाने के लिए तैयार किए गए पात्र के बीच में रख दें। देवी-देवताओं का आह्वान करते हुए प्रार्थना करें:

हे समस्त देवी-देवता! आप सभी नौ दिनों के लिए कृपया इस कलश में विराजमान हों।

आह्वान के बाद सभी देवी-देवताओं को कलश में विराजमान मानकर उसकी पूजा करें। कलश को तिलक लगाएं। अक्षत चढ़ाएं। फूल-माला और इत्र अर्पित करें। नैवेद्य यानी फल-मिठाई आदि अर्पित करें।

घट स्थापना के बाद दुर्गा पूजन शुरू करें। चौकी को साफ करके माता की चौकी सजाएं। आसन बिछाकर गणपति और दुर्गा माता की मूर्ति के सम्मुख बैठ जाएं। इसके बाद अपने आपको तथा आसन को मंत्रों से शुद्ध करें।

पूजन से पहले शुद्धि मंत्र

ॐ अपवित्र : पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा।
य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि :॥

इन मंत्रों से अपने ऊपर तथा आसन पर 3-3 बार कुशा या पुष्प आदि से जल के छींटे लगाएं।

आचमन मंत्र

ॐ केशवाय नम:।
ॐ नारायणाय नम:।
ॐ माधवाय नम:।
ॐ गोविन्दाय नम:।

इसके बाद हाथ धोएं। पुनः आसन शुद्धि मंत्र बोलें।

आसन शुद्धि मंत्र

ॐ पृथ्वी त्वयाधृता लोका देवि त्वं विष्णुनाधृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥

शुद्धि और आचमन के बाद चंदन लगाएं। अनामिका उंगली से श्रीखंड चंदन लगाते हुए यह मंत्र बोलें।

चंदन मंत्र

चन्दनस्य महत्पुण्यम् पवित्रं पापनाशनम्।
आपदां हरते नित्यम् लक्ष्मी तिष्ठतु सर्वदा॥

दुर्गा पूजन हेतु संकल्प

पंचोपचार करने के बाद किसी भी पूजन को आरंभ करने से पहले संकल्प करना चाहिए। संकल्प से पूजा का उद्देश्य बताया जाता है।

संकल्प के लिए पुष्प, फल, सुपारी, पान, चांदी का सिक्का, नारियल, मिठाई और मेवा आदि थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लें। फिर संकल्प मंत्र बोलें।

संकल्प मंत्र:

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:। ॐ अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपतेः 2084 तमेऽब्दे प्लवंग नाम संवत्सरे श्रीसूर्य उत्तरायने उत्तरगोले वसन्त ऋतौ महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे चैत्र मासे शुक्ल पक्षे प्रतिपदायां तिथौ बुधवारवासरे (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लें) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया श्रुतिस्मृत्योक्तफलप्राप्त्यर्थं मनेप्सित कार्य सिद्धयर्थं श्री दुर्गा पूजनं च अहं करिष्ये। तत्पूर्वागंत्वेन निर्विघ्नतापूर्वक कार्य सिद्धयर्थं यथामिलितोपचारे गणपति पूजनं करिष्ये।

नोट: संकल्प में अपना नाम, गोत्र और नगर का नाम अवश्य भरें। यहां दिया गया संवत् और वार 7 अप्रैल 2027 के अनुसार रखा गया है। पारिवारिक या क्षेत्रीय संकल्प पद्धति में आचार्य से पुष्टि कर लें।

दुर्गा पूजन विधि

सबसे पहले माता दुर्गा का ध्यान करें।

ध्यान मंत्र:

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते॥

आवाहन:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। दुर्गादेवीमावाहयामि॥

आसन:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि॥

अर्घ्य:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। हस्तयोः अर्घ्यं समर्पयामि॥

आचमन:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। आचमनं समर्पयामि॥

स्नान:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। स्नानार्थं जलं समर्पयामि॥

स्नान के बाद पुनः आचमन के लिए जल अर्पित करें।

स्नानान्ते पुनराचमनीयं जलं समर्पयामि।

पंचामृत स्नान:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। पंचामृतस्नानं समर्पयामि॥

पंचामृत स्नान कराने के बाद पात्र में आचमन के लिए जल छोड़ें।

गंधोदक स्नान:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। गन्धोदकस्नानं समर्पयामि॥

गंधोदक स्नान यानी रोली और चंदन मिश्रित जल से स्नान कराएं। इसके बाद आचमन के लिए जल छोड़ें।

शुद्धोदक स्नान:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि॥

शुद्धोदक स्नान कराने के बाद आचमन हेतु जल अर्पित करें।

शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।

वस्त्र:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। वस्त्रं समर्पयामि॥

वस्त्र पहनाने के बाद आचमन के लिए जल छोड़ें।

सौभाग्य सूत्र:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। सौभाग्यसूत्रं समर्पयामि॥

माता को मंगलसूत्र या हार पहनाएं।

चंदन:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। चन्दनं समर्पयामि॥

माता को चंदन लगाएं।

हल्दी:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। हरिद्रां समर्पयामि॥

हल्दी अर्पण करें।

कुंकुम:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। कुंकुमं समर्पयामि॥

कुमकुम अर्पण करें।

सिंदूर:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। सिन्दूरं समर्पयामि॥

सिंदूर अर्पण करें।

काजल:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। कज्जलं समर्पयामि॥

काजल अर्पण करें।

दूर्वा:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। दूर्वांकुरान् समर्पयामि॥

दूर्वा चढ़ाएं।

आभूषण:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। आभूषणानि समर्पयामि॥

यथासामर्थ्य आभूषण पहनाएं।

पुष्पमाला:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। पुष्पमालां समर्पयामि॥

माता को फूल-माला पहनाएं।

धूप:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। धूपमाघ्रापयामि॥

धूप दिखाएं।

दीप:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। दीपं दर्शयामि॥

दीप दिखाएं।

नैवेद्य:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। नैवेद्यं निवेदयामि॥

नैवेद्य अर्पित करने के बाद तीन बार आचमन हेतु जल छोड़ें।

नैवेद्यान्ते त्रिवारं आचमनीयं जलं समर्पयामि।

फल:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। फलानि समर्पयामि॥

फल अर्पण करें। इसके बाद एक बार आचमन हेतु जल छोड़ें।

तांबूल:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। ताम्बूलं समर्पयामि॥

लौंग, सुपारी और इलायची सहित पान अर्पित करें।

दक्षिणा:

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। दक्षिणां समर्पयामि॥

यथासामर्थ्य माता को दक्षिणा अर्पित करें। मनोकामना पूर्ति के लिए प्रार्थना करें। माता से कहें कि यह सब आपका ही दिया हुआ है। हम आपको कुछ देने योग्य नहीं हैं।

मां दुर्गा की आरती

पूजन के बाद मां दुर्गा की आरती करें।

जय अंबे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥ ॐ जय…

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥ ॐ जय…

कनक समान कलेवर, रक्तांबर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै॥ ॐ जय…

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥ ॐ जय…

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर, राजत सम ज्योती॥ ॐ जय…

शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥ ॐ जय…

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भय दूर करे॥ ॐ जय…

ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥ ॐ जय…

चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैंरू।
बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू॥ ॐ जय…

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुख हरता, सुख संपति करता॥ ॐ जय…

भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥ ॐ जय…

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती॥ ॐ जय…

श्री अंबेजी की आरति, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावे॥ ॐ जय…

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नमः। आरार्तिकं समर्पयामि॥

आरती के बाद आरती की थाली के चारों तरफ जल घुमाएं। इसके बाद माता से पूजा में हुई भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

मां दुर्गा की क्षमा प्रार्थना मंत्र

पूजा में जाने-अनजाने हुई गलतियों के लिए माता से क्षमा मांगें। हाथ जोड़कर नीचे दिए गए क्षमा प्रार्थना के श्लोकों का पाठ करें।

श्लोक 1

न मंत्रं नोयंत्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्॥1॥

श्लोक 2

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्।
तदेतत्क्षतव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥2॥

श्लोक 3

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः।
मदीयोऽयंत्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत् क्वचिदपि कुमाता न भवति॥3॥

श्लोक 4

जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया।
तथापित्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत् क्वचिदपि कुमाता न भवति॥4॥

श्लोक 5

परित्यक्तादेवा विविधविधिसेवाकुलतया
मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि।
इदानीं चेन्मातस्तव कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदर जननि कं यामि शरणम्॥5॥

श्लोक 6

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातंको रंको विहरति चिरं कोटिकनकैः।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ॥6॥

श्लोक 7

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम्॥7॥

श्लोक 8

न मोक्षस्याकांक्षा भवविभव वांछापिचनमे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडाणी रुद्राणी शिवशिव भवानीति जपतः॥8॥

श्लोक 9

नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रूक्षचिंतन परैर्नकृतं वचोभिः।
श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव॥9॥

श्लोक 10

आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति॥10॥

श्लोक 11

जगदंब विचित्रमत्र किं परिपूर्ण करुणास्ति चिन्मयि।
अपराधपरंपरावृतं नहि मातासमुपेक्षते सुतम्॥11॥

श्लोक 12

मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा नहि।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु॥12॥

चैत्र नवरात्रि पूजा का समापन

क्षमा प्रार्थना के बाद सभी लोग मां दुर्गा को साष्टांग प्रणाम करें। घर में सुख-समृद्धि और शांति की कामना करें। माता का प्रसाद सभी भक्तों में बांटें।

मां दुर्गा की कृपा से सभी भक्तों के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे। माता सभी के कष्ट दूर करें और मनोकामनाएं पूर्ण करें।

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चैत्र नवरात्रि 2027 से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQ)

Q1. चैत्र नवरात्रि 2027 कब से शुरू होगी ?

चैत्र नवरात्रि 7 अप्रैल 2027, बुधवार से शुरू होगी। इसी दिन घट स्थापना की जाएगी।

Q2. चैत्र नवरात्रि 2027 में घट स्थापना का शुभ मुहूर्त क्या है ?

नई दिल्ली के अनुसार 7 अप्रैल 2027 को घट स्थापना का मुहूर्त सुबह 6:05 बजे से 7:26 बजे तक है। स्थानीय समय में अंतर हो सकता है।

चैत्र नवरात्रि 2027 में दुर्गा अष्टमी कब है ?

दुर्गा अष्टमी 14 अप्रैल 2027, बुधवार को मनाई जाएगी। इस दिन मां महागौरी की पूजा होती है।

Q4. राम नवमी 2027 कब मनाई जाएगी ?

राम नवमी 15 अप्रैल 2027, गुरुवार को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव मनाया जाता है।

Q5. चैत्र नवरात्रि में किसकी पूजा की जाती है ?

चैत्र नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। भक्त नौ दिनों तक व्रत, पूजा और मंत्र जाप करते हैं।

Q6. चैत्र नवरात्रि में घट स्थापना कैसे करें ?

घट स्थापना के लिए मिट्टी के पात्र में जौ बोएं। इसके बाद जल से भरा कलश तैयार करें। कलश पर मौली बांधें और आम के पत्ते तथा नारियल रखें। शुभ मुहूर्त में कलश स्थापित करके मां दुर्गा का आह्वान करें।

निष्कर्ष

चैत्र नवरात्रि 2027 का पावन पर्व 7 अप्रैल से शुरू होगा। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाएगी। 14 अप्रैल को दुर्गा अष्टमी और 15 अप्रैल को राम नवमी मनाई जाएगी।

माता रानी की कृपा सभी भक्तों पर बनी रहे। सभी के घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास हो।

जय माता दी! 🌺

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