Site icon RadheRadheje

Radha ashtmi 2026 जानें राधा अष्टमी पूजन विधि शुभ मुहूर्त और महत्व


राधा अष्टमी 2026: कब है, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत नियम, कथा, आरती और राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र

Radha Ashtami 2026 हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और श्रद्धापूर्ण पर्व है। यह दिन श्रीराधा रानी के दिव्य प्राकट्य उत्सव के रूप में मनाया जाता है। राधा रानी को श्रीकृष्ण की परम प्रिय शक्ति तथा भक्ति की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ व्रत, पूजन, मंत्र जाप एवं राधा-कृष्ण की आराधना करने से जीवन में प्रेम, सुख, समृद्धि, सौभाग्य और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

राधा अष्टमी का पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन देशभर के राधा-कृष्ण मंदिरों में विशेष पूजा, भजन-कीर्तन, अभिषेक और झांकियों का आयोजन किया जाता है। विशेष रूप से बरसाना, वृंदावन, रावल और मथुरा में यह पर्व अत्यंत भव्य रूप से मनाया जाता है। यदि किसी कारणवश आप व्रत न रख सकें, तब भी श्रद्धापूर्वक राधा रानी का स्मरण, नाम-जप और पूजा करने से उनकी असीम कृपा प्राप्त होती है।


राधा अष्टमी 2026 शुभ मुहूर्त

विवरण समय
पर्व राधा अष्टमी 2026
तिथि शनिवार, 19 सितंबर 2026
अष्टमी तिथि प्रारंभ शुक्रवार, 18 सितंबर दोपहर 1:00 pm 
अष्टमी तिथि समाप्त शनिवार, 19 सितंबर दोपहर 3:26 pm
मध्याह्न पूजा मुहूर्त 11:01 AM to 01:28 PM (Duration: 2 hours 27 minutes) 

Radha Ashtami Significance राधा अष्टमी का महत्व

वेद, पुराण तथा विभिन्न वैष्णव ग्रंथों में श्रीराधा रानी को भगवान श्रीकृष्ण की परम प्रिय शक्ति और भक्ति स्वरूपा बताया गया है। श्रीराधा के बिना श्रीकृष्ण की उपासना अधूरी मानी जाती है। इसलिए राधा अष्टमी का पर्व केवल जन्मोत्सव नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण और भक्ति का महापर्व माना जाता है।

श्रीमद् देवी भागवत एवं अन्य ग्रंथों में कहा गया है कि जो भक्त श्रद्धा से श्रीराधा रानी की पूजा, मंत्र-जप, कथा श्रवण तथा व्रत करता है, उसके जीवन में सुख, समृद्धि, सौभाग्य और आध्यात्मिक उन्नति आती है। राधा नाम का स्मरण करने मात्र से मन को शांति मिलती है तथा भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है।

मान्यता है कि राधाष्टमी के दिन किए गए दान, जप, तप, भजन और सेवा का फल कई गुना बढ़ जाता है। इस दिन राधा-कृष्ण की संयुक्त पूजा करने से दांपत्य जीवन में प्रेम, परिवार में सुख-शांति तथा मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।


राधा अष्टमी व्रत विधि

राधा अष्टमी के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर भगवान का स्मरण करें। इसके बाद स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें तथा घर और मंदिर की साफ-सफाई करें।

स्नान के बाद आचमन करें और निम्न मंत्रों का जप करें।

ॐ केशवाय नमः।
ॐ नारायणाय नमः।
ॐ माधवाय नमः।
ॐ हृषीकेशाय नमः॥

अब पूजा स्थान पर लाल अथवा पीला वस्त्र बिछाकर श्रीराधा-कृष्ण की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें।

राधा रानी और श्रीकृष्ण का पंचामृत से अभिषेक करें तथा उन्हें नए वस्त्र, पुष्प, चंदन, रोली, अक्षत और तुलसी अर्पित करें।

देसी घी का दीपक जलाकर धूप अर्पित करें और राधा-कृष्ण के मंत्रों का जप करें।

इसके बाद माखन-मिश्री, फल, दूध, दही, पंचामृत तथा अन्य सात्विक भोग अर्पित करें।

पूरे दिन श्रद्धा और संयम के साथ व्रत रखें तथा राधा-कृष्ण के भजन, नाम-जप और कथा का श्रवण करें।

संध्याकाल में पुनः आरती करें और फलाहार ग्रहण करें। अगले दिन विधिपूर्वक पूजा करने के बाद व्रत का पारण करें।


राधाष्टमी पूजन विधि

राधाष्टमी के दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ श्रीराधा रानी का पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। इसके बाद उनका सुंदर श्रृंगार किया जाता है और सुगंधित पुष्प, वस्त्र तथा आभूषण अर्पित किए जाते हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन राधा-कृष्ण की संयुक्त पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। धूप, दीप, नैवेद्य और पुष्प अर्पित कर उनकी आरती की जाती है।

मंदिरों में विशेष रूप से भजन-कीर्तन, संकीर्तन, भागवत पाठ, राधा नाम संकीर्तन तथा महाअभिषेक का आयोजन किया जाता है।

नारद पुराण के अनुसार राधाष्टमी का व्रत करने वाला भक्त पापों से मुक्त होकर भगवान श्रीकृष्ण तथा श्रीराधा रानी की विशेष कृपा प्राप्त करता है।




राधा अष्टमी व्रत के नियम

राधा अष्टमी का व्रत केवल उपवास नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म की शुद्धि का भी पर्व है। इस दिन निम्नलिखित नियमों का पालन करना शुभ माना जाता है।


राधाष्टमी की कथा

राधाष्टमी की कथा श्रीराधा रानी के दिव्य प्राकट्य से जुड़ी हुई है। धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रीराधा रानी वृषभानु गोप और माता कीर्ति की पुत्री थीं। पद्म पुराण के अनुसार राजा वृषभानु एक यज्ञ के लिए भूमि तैयार कर रहे थे। उसी समय उन्हें भूमि से एक दिव्य कन्या प्राप्त हुई। राजा ने उस कन्या को ईश्वर का प्रसाद मानकर अपनी पुत्री के रूप में अपनाया और उसका पालन-पोषण किया। वही दिव्य कन्या आगे चलकर श्रीराधा रानी के नाम से विख्यात हुईं।

एक अन्य मान्यता के अनुसार जब भगवान श्रीविष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में पृथ्वी पर अवतार लेने का निश्चय किया, तब माता लक्ष्मी ने भी राधा रूप में अवतार लिया। इस प्रकार श्रीराधा और श्रीकृष्ण का संबंध केवल सांसारिक नहीं, बल्कि दिव्य और सनातन माना जाता है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में श्रीराधा को भगवान श्रीकृष्ण की परम प्रिय शक्ति बताया गया है। उनके प्रेम को आत्मा और परमात्मा के शाश्वत मिलन का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण राधा-कृष्ण का नाम सदैव एक साथ लिया जाता है।

मान्यता है कि जो श्रद्धापूर्वक राधाष्टमी का व्रत, कथा श्रवण और पूजा करता है, उसे सुख, समृद्धि, प्रेम, सौभाग्य तथा भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा की विशेष कृपा प्राप्त होती है।


Must Read राधा रानी के अट्ठाईस नाम: राधा रानी के इन 28 नाम को जपके जो मांगोगे वही मिलेगा


॥ श्री राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र ॥

श्रीराधा कृपाकटाक्ष स्तोत्र का नित्य श्रद्धापूर्वक पाठ करने से साधक पर श्रीराधा रानी एवं भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

स्तोत्र

राधा साध्यं साधनं यस्य राधा।
मंत्रो राधा मन्त्रदात्री च राधा॥
सर्वं राधा जीवनं यस्य राधा।
राधा राधा वाचि किं तस्य शेषम्॥

भावार्थ : राधा साध्य है उनको पाने का साधन भी राधा नाम ही है। मन्त्र भी राधा है और मन्त्र देने वाली गुरु भी स्वयं राधा जी ही है सब कुछ राधा नाम में ही समाया हुआ है और सबका जीवन प्राण भी राधा ही है राधा नाम के अतिरिक्त ब्रम्हांड में शेष बचता क्या है ?


॥ श्री राधा कृपा कटाक्ष स्रोत ॥ (Shree Radha’s grace sarcasm source with Hindi meaning)

वृन्दावन के विभिन्न मन्दिरों में नित्य किया जाता है। इस स्तोत्र के पाठ से साधक नित्यनिकुंजेश्वरि श्रीराधा और उनके प्राणवल्लभ नित्यनिकुंजेश्वर ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण की सुर-मुनि दुर्लभ कृपाप्रसाद अनायास ही प्राप्त कर लेता है।

स्तोत्र

“राधा साध्यम साधनं यस्य राधा,

मंत्रो राधा मन्त्र दात्री च राधा

सर्वं राधा जीवनम् यस्य राधा,

राधा राधा वाचि किम तस्य शेषम”

भावार्थ: राधा साध्य है उनको पाने का साधन भी राधा नाम ही है। मन्त्र भी राधा है और मन्त्र देने वाली गुरु भी स्वयं राधा जी ही है सब कुछ राधा नाम में ही समाया हुआ है और सबका जीवन प्राण भी राधा ही है राधा नाम के अतिरिक्त ब्रम्हांड में शेष बचता क्या है ?

श्लोक 1

मुनीन्दवृन्दवन्दिते त्रिलोकशोकहारिणी,

प्रसन्नवक्त्रपंकजे निकंजभूविलासिनी।

व्रजेन्दभानुनन्दिनी व्रजेन्द सूनुसंगते,

कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (१)

भावार्थ : समस्त मुनिगण आपके चरणों की वंदना करते हैं, आप तीनों लोकों का शोक दूर करने वाली हैं, आप प्रसन्नचित्त प्रफुल्लित मुख कमल वाली हैं, आप धरा पर निकुंज में विलास करने वाली हैं। आप राजा वृषभानु की राजकुमारी हैं, आप ब्रजराज नन्द किशोर श्री कृष्ण की चिरसंगिनी है, हे जगज्जननी श्रीराधे माँ आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (१)

श्लोक 2

अशोकवृक्ष वल्लरी वितानमण्डपस्थिते,

प्रवालज्वालपल्लव प्रभारूणाङि्घ् कोमले।

वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये,

कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (२)

भावार्थ : आप अशोक की वृक्ष-लताओं से बने हुए मंदिर में विराजमान हैं, आप सूर्य की प्रचंड अग्नि की लाल ज्वालाओं के समान कोमल चरणों वाली हैं, आप भक्तों को अभीष्ट वरदान, अभय दान देने के लिए सदैव उत्सुक रहने वाली हैं। आप के हाथ सुन्दर कमल के समान हैं, आप अपार ऐश्वर्य की भंङार स्वामिनी हैं, हे सर्वेश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (२)

श्लोक 3

अनंगरंगमंगल प्रसंगभंगुरभ्रुवां,

सुविभ्रम ससम्भ्रम दृगन्तबाणपातनैः।

निरन्तरं वशीकृत प्रतीतनन्दनन्दने,

कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (३)

भावार्थ : रास क्रीड़ा के रंगमंच पर मंगलमय प्रसंग में आप अपनी बाँकी भृकुटी से आश्चर्य उत्पन्न करते हुए सहज कटाक्ष रूपी वाणों की वर्षा करती रहती हैं। आप श्री नन्दकिशोर को निरंतर अपने बस में किये रहती हैं, हे जगज्जननी वृन्दावनेश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (३)

श्लोक 4

तड़ित्सुवणचम्पक प्रदीप्तगौरविगहे,

मुखप्रभापरास्त-कोटिशारदेन्दुमण्ङले।

विचित्रचित्र-संचरच्चकोरशावलोचने,

कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (४)

भावार्थ : आप बिजली के सदृश, स्वर्ण तथा चम्पा के पुष्प के समान सुनहरी आभा वाली हैं, आप दीपक के समान गोरे अंगों वाली हैं, आप अपने मुखारविंद की चाँदनी से शरद पूर्णिमा के करोड़ों चन्द्रमा को लजाने वाली हैं। आपके नेत्र पल-पल में विचित्र चित्रों की छटा दिखाने वाले चंचल चकोर शिशु के समान हैं, हे वृन्दावनेश्वरी माँ आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (४)

श्लोक 5

मदोन्मदातियौवने प्रमोद मानमणि्ते,

प्रियानुरागरंजिते कलाविलासपणि्डते।

अनन्यधन्यकुंजराज कामकेलिकोविदे

कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (५)

भावार्थ : आप अपने चिर-यौवन के आनन्द के मग्न रहने वाली है, आनंद से पूरित मन ही आपका सर्वोत्तम आभूषण है, आप अपने प्रियतम के अनुराग में रंगी हुई विलासपूर्ण कला पारंगत हैं। आप अपने अनन्य भक्त गोपिकाओं से धन्य हुए निकुंज-राज के प्रेम क्रीड़ा की विधा में भी प्रवीण हैं, हे निकुँजेश्वरी माँ आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (५)

श्लोक 6

अशेषहावभाव धीरहीर हार भूषिते,

प्रभूतशातकुम्भकुम्भ कुमि्भकुम्भसुस्तनी।

प्रशस्तमंदहास्यचूणपूणसौख्यसागरे,

कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (६)

भावार्थ : आप संपूर्ण हाव-भाव रूपी श्रृंगारों से परिपूर्ण हैं, आप धीरज रूपी हीरों के हारों से विभूषित हैं, आप शुद्ध स्वर्ण के कलशों के समान अंगो वाली है, आपके पयोंधर स्वर्ण कलशों के समान मनोहर हैं। आपकी मंद-मंद मधुर मुस्कान सागर के समान आनन्द प्रदान करने वाली है, हे कृष्णप्रिया माँ आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (६)

श्लोक 7

मृणालबालवल्लरी तरंगरंगदोलते,

लतागलास्यलोलनील लोचनावलोकने।

ललल्लुलमि्लन्मनोज्ञ मुग्ध मोहनाश्रये,

कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (७)

भावार्थ : जल की लहरों से कम्पित हुए नूतन कमल-नाल के समान आपकी सुकोमल भुजाएँ हैं, आपके नीले चंचल नेत्र पवन के झोंकों से नाचते हुए लता के अग्र-भाग के समान अवलोकन करने वाले हैं। सभी के मन को ललचाने वाले, लुभाने वाले मोहन भी आप पर मुग्ध होकर आपके मिलन के लिये आतुर रहते हैं ऎसे मनमोहन को आप आश्रय देने वाली हैं, हे वृषभानुनन्दनी माँ आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (७)

श्लोक 8

सुवर्ण्मालिकांचिते त्रिरेखकम्बुकण्ठगे,

त्रिसुत्रमंगलीगुण त्रिरत्नदीप्तिदीधिअति।

सलोलनीलकुन्तले प्रसूनगुच्छगुम्फिते,

कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (८)

भावार्थ : आप स्वर्ण की मालाओं से विभूषित है, आप तीन रेखाओं युक्त शंख के समान सुन्दर कण्ठ वाली हैं, आपने अपने कण्ठ में प्रकृति के तीनों गुणों का मंगलसूत्र धारण किया हुआ है, इन तीनों रत्नों से युक्त मंगलसूत्र समस्त संसार को प्रकाशमान कर रहा है। आपके काले घुंघराले केश दिव्य पुष्पों के गुच्छों से अलंकृत हैं, हे कीरतिनन्दनी माँ आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (८)

श्लोक 9

नितम्बबिम्बलम्बमान पुष्पमेखलागुण,

प्रशस्तरत्नकिंकणी कलापमध्यमंजुले।

करीन्द्रशुण्डदण्डिका वरोहसोभगोरुके,

कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥ (९)

भावार्थ : आपका उर भाग में फूलों की मालाओं से शोभायमान हैं, आपका मध्य भाग रत्नों से जड़ित स्वर्ण आभूषणों से सुशोभित है। आपकी जंघायें हाथी की सूंड़ के समान अत्यन्त सुन्दर हैं, हे ब्रजनन्दनी माँ आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (९)

श्लोक 10

अनेकमन्त्रनादमंजु नूपुरारवस्खलत्,

समाजराजहंसवंश निक्वणातिग।

विलोलहेमवल्लरी विडमि्बचारूचं कमे,

कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (१०)

भावार्थ : आपके चरणों में स्वर्ण मण्डित नूपुर की सुमधुर ध्वनि अनेकों वेद मंत्रो के समान गुंजायमान करने वाले हैं, जैसे मनोहर राजहसों की ध्वनि गूँजायमान हो रही है। आपके अंगों की छवि चलते हुए ऐसी प्रतीत हो रही है जैसे स्वर्णलता लहरा रही है, हे जगदीश्वरी माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (१०)

श्लोक 11

अनन्तकोटिविष्णुलोक नमपदमजाचिते,

हिमादिजा पुलोमजा-विरंचिजावरप्रदे।

अपारसिदिवृदिदिग्ध -सत्पदांगुलीनखे,

कदा करिष्यसीह मां कृपा -कटाक्ष भाजनम्॥ (११)

भावार्थ : अनंत कोटि बैकुंठो की स्वामिनी श्रीलक्ष्मी जी आपकी पूजा करती हैं, श्रीपार्वती जी, इन्द्राणी जी और सरस्वती जी ने भी आपकी चरण वन्दना कर वरदान पाया है। आपके चरण-कमलों की एक उंगली के नख का ध्यान करने मात्र से अपार सिद्धि की प्राप्ति होती है, हे करूणामयी माँ आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (११)

श्लोक 12

मखेश्वरी क्रियेश्वरी स्वधेश्वरी सुरेश्वरी,

त्रिवेदभारतीयश्वरी प्रमाणशासनेश्वरी।

रमेश्वरी क्षमेश्वरी प्रमोदकाननेश्वरी,

ब्रजेश्वरी ब्रजाधिपे श्रीराधिके नमोस्तुते॥ (१२)

भावार्थ : आप सभी प्रकार के यज्ञों की स्वामिनी हैं, आप संपूर्ण क्रियाओं की स्वामिनी हैं, आप स्वधा देवी की स्वामिनी हैं, आप सब देवताओं की स्वामिनी हैं, आप तीनों वेदों की स्वामिनी है, आप संपूर्ण जगत पर शासन करने वाली हैं। आप रमा देवी की स्वामिनी हैं, आप क्षमा देवी की स्वामिनी हैं, आप आमोद-प्रमोद की स्वामिनी हैं, हे ब्रजेश्वरी! हे ब्रज की अधीष्ठात्री देवी श्रीराधिके! आपको मेरा बारंबार नमन है। (१२)

श्लोक 13

इतीदमतभुतस्तवं निशम्य भानुननि्दनी,

करोतु संततं जनं कृपाकटाक्ष भाजनम्।

भवेत्तादैव संचित-त्रिरूपकमनाशनं,

लभेत्तादब्रजेन्द्रसूनु मण्डलप्रवेशनम्॥ (१३)

भावार्थ : हे वृषभानु नंदिनी! मेरी इस निर्मल स्तुति को सुनकर सदैव के लिए मुझ दास को अपनी दया दृष्टि से कृतार्थ करने की कृपा करो। केवल आपकी दया से ही मेरे प्रारब्ध कर्मों, संचित कर्मों और क्रियामाण कर्मों का नाश हो सकेगा, आपकी कृपा से ही भगवान श्रीकृष्ण के नित्य दिव्यधाम की लीलाओं में सदा के लिए प्रवेश हो जाएगा। (१३)

स्तोत्र पाठ करने की विधि व फलश्रुति 

श्लोक 14

राकायां च सिताष्टम्यां दशम्यां च विशुद्धया,

एकादश्यां त्रयोदश्यां य: पठेत्साधक: सुधी।

यं यं कामयते कामं तं तं प्राप्नोति साधक:,

राधाकृपाकटाक्षेण भक्ति: स्यात् प्रेमलक्षणा।।१४।।

भावार्थ पूर्णिमा के दिन, शुक्लपक्ष की अष्टमी या दशमी को तथा दोनों पक्षों की एकादशी और त्रयोदशी को जो शुद्ध बुद्धि वाला भक्त इस स्तोत्र का पाठ करेगा, वह जो भावना करेगा वही प्राप्त होगा, अन्यथा निष्काम भावना से पाठ करने पर श्रीराधाजी की दयादृष्टि से पराभक्ति प्राप्त होगी।

श्लोक 15

उरुमात्रे नाभिमात्रे हृन्मात्रे कंठमात्रके,

राधाकुण्ड-जले स्थित्वा य: पठेत्साधक:शतम्।।

तस्य सर्वार्थसिद्धि:स्यात् वांछितार्थ फलंलभेत्,

ऐश्वर्यं च लभेत्साक्षात्दृशा पश्यतिराधिकाम्।।१५।।

भावार्थ इस स्तोत्र के विधिपूर्वक व श्रद्धा से पाठ करने पर श्रीराधा-कृष्ण का साक्षात्कार होता है। इसकी विधि इस प्रकार है–गोवर्धन में श्रीराधाकुण्ड के जल में जंघाओं तक या नाभिपर्यन्त या छाती तक या कण्ठ तक जल में खड़े होकर इस स्तोत्र का १०० बार पाठ करे। इस प्रकार कुछ दिन पाठ करने पर सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थ प्राप्त हो जाते हैं। ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। भक्तों को इन्हीं से साक्षात् श्रीराधाजी का दर्शन होता है।

श्लोक 16

तेन सा तत्क्षणादेव तुष्टा दत्ते महावरम्।

येन पश्यति नेत्राभ्यां तत्प्रियं श्यामसुन्दरम्।।

नित्य लीला प्रवेशं च ददाति श्रीब्रजाधिप:।

अत: परतरं प्राप्यं वैष्णवानां न विद्यते।।१६।।

भावार्थ श्रीराधाजी प्रकट होकर प्रसन्नतापूर्वक वरदान देती हैं अथवा अपने चरणों का महावर (जावक) भक्त के मस्तक पर लगा देती हैं। वरदान में केवल अपनी प्रिय वस्तु दो यही मांगना चाहिए। तब भगवान श्रीकृष्ण प्रकट होकर दर्शन देते है और प्रसन्न होकर श्रीव्रजराजकुमार नित्य लीलाओं में प्रवेश प्रदान करते हैं। इससे बढ़कर वैष्णवों के लिए कोई भी वस्तु नहीं है।

किसी-किसी को राधाकुण्ड के जल में १०० पाठ करने पर एक ही दिन में दर्शन हो जाता है। किसी को कुछ समय लग जाता है इसलिए जब तक दर्शन न हों, पाठ करते रहें। किसी को घर में ही नित्य १०० पाठ करने से कुछ ही दिनों में इष्ट प्राप्ति हो जाती है।

श्रीराधा जी की आरती 

आरती श्री वृषभानुसुता की।

मंजु मूर्ति मोहन ममताकी ।। टेक।।

त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि,

विमल विवेकविराग विकासिनि।

पावन प्रभु पद प्रीति प्रकाशिनि,

सुन्दरतम छवि सुन्दरता की।

मुनि मन मोहन मोहन मोहनि,

मधुर मनोहर मूरती सोहनि।

अविरलप्रेम अमिय रस दोहनि,

प्रिय अति सदा सखी ललिताकी।।

संतत सेव्य सत मुनि जनकी,

आकर अमित दिव्यगुन गनकी,

आकर्षिणी कृष्ण तन मनकी,

अति अमूल्य सम्पति समता की।।

कृष्णात्मिका, कृषण सहचारिणि,

चिन्मयवृन्दा विपिन विहारिणि।

जगज्जननि जग दुःखनिवारिणि,

आदि अनादिशक्ति विभुताकी।।

श्री राधा रानी जी की आरती

श्री राधारानी की आरती Aarti of Shri Radharani 

आरती राधाजी की कीजै।

कृष्ण संग जो कर निवासा, कृष्ण करे जिन पर विश्वासा।

आरती वृषभानु लली की कीजै। आरती

कृष्णचन्द्र की करी सहाई, मुंह में आनि रूप दिखाई।

उस शक्ति की आरती कीजै। आरती

नंद पुत्र से प्रीति बढ़ाई, यमुना तट पर रास रचाई।

आरती रास रसाई की कीजै। आरती

प्रेम राह जिनसे बतलाई, निर्गुण भक्ति नहीं अपनाई।

आरती राधाजी की कीजै। आरती

दुनिया की जो रक्षा करती, भक्तजनों के दुख सब हरती।

आरती दु:ख हरणीजी की कीजै। आरती

दुनिया की जो जननी कहावे, निज पुत्रों की धीर बंधावे।

आरती जगत माता की कीजै। आरती

निज पुत्रों के काज संवारे, रनवीरा के कष्ट निवारे।

आरती विश्वमाता की कीजै। आरती राधाजी की कीजै ।

श्रीकृष्ण की आरती 

आरती कुंजबिहारी की,श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की,श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला

श्रवण में कुण्डल झलकाला,नंद के आनंद नंदलाला

गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली

लतन में ठाढ़े बनमाली भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक

चंद्र सी झलक, ललित छवि श्यामा प्यारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की, आरती कुंजबिहारी की…॥

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।

गगन सों सुमन रासि बरसै, बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग ग्वालिन संग।

अतुल रति गोप कुमारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

॥ आरती कुंजबिहारी की…॥

जहां ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणि श्री गंगा।

स्मरन ते होत मोह भंगा, बसी शिव सीस।

जटा के बीच,हरै अघ कीच, चरन छवि श्रीबनवारी की

श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥ ॥ आरती कुंजबिहारी की…॥

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू

चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू

हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद।

टेर सुन दीन दुखारी की

श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

॥ आरती कुंजबिहारी की…॥

आरती कुंजबिहारी की

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

Must Read Radha Rani: जानें श्री राधारानी के चरणारविन्दों में उन्नीस चरण मंगल चिन्ह और उनका अर्थ


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. राधा अष्टमी 2026 कब है ?

राधा अष्टमी वर्ष 2026 में 19 सितंबर, शनिवार को मनाई जाएगी।

Q2. राधा अष्टमी का महत्व क्या है ?

यह श्रीराधा रानी के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाई जाती है। इस दिन पूजा और व्रत करने से प्रेम, सुख, समृद्धि तथा श्रीराधा-कृष्ण की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है।

Q3. राधा अष्टमी पर क्या करना चाहिए ?

प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें, राधा-कृष्ण की पूजा करें, भजन-कीर्तन करें, नाम-जप करें तथा सात्विक भोजन ग्रहण करें।

Q4. क्या बिना व्रत के भी पूजा की जा सकती है ?

हाँ। यदि स्वास्थ्य या अन्य कारणों से व्रत संभव न हो, तो श्रद्धापूर्वक पूजा, भजन और नाम-स्मरण किया जा सकता है।

Q5. राधा अष्टमी पर कौन-सा भोग लगाना चाहिए ?

माखन-मिश्री, पंचामृत, दूध, दही, फल, मेवा और अन्य सात्विक प्रसाद अर्पित किए जा सकते हैं।

Q6. राधा अष्टमी पर कौन-सा मंत्र जप करना चाहिए ?

राधा नाम का जप, राधा-कृष्ण मंत्र या अपने गुरु द्वारा दिए गए मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करना शुभ माना जाता है।


डिसक्लेमर

इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न धार्मिक ग्रंथों, पंचांगों, मान्यताओं और पारंपरिक स्रोतों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल धार्मिक एवं सामान्य जानकारी प्रदान करना है। किसी भी पूजा, व्रत या धार्मिक अनुष्ठान से पहले अपने गुरु, आचार्य या विश्वसनीय पंचांग से तिथि एवं मुहूर्त की पुष्टि अवश्य करें।

Exit mobile version