
शाकम्भरी नवरात्रि 2026 | धन-धान्य, स्वास्थ्य और विवाह योग देने वाली अद्भुत देवी शाकम्भरी
शाकम्भरी नवरात्रि उत्सव पौष शुक्ल अष्टमी से आरम्भ होकर पौष की पूर्णिमा को समाप्त होता है। वैसे तो वर्ष भर में चार नवरात्रि मानी गई है, आश्विन माह के शुक्ल पक्ष में शारदीय नवरात्रि, चैत्र शुक्ल पक्ष में आने वाली चैत्र नवरात्रि, तृतीय और चतुर्थ नवरात्रि माघ और आषाढ़ माह में मनाई जाती है। परंतु तंत्र-मंत्र के साधकों को अपनी सिद्धि के लिए खास माने जाने वाली शाकंभरी नवरात्रि का आरंभ पौष मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से होता है, जो पौष पूर्णिमा पर समाप्त होता है।
समापन के दिन मां शाकंभरी जयंती भी मनाई जाएगी। तंत्र-मंत्र के जानकारों की नजर में इस नवरात्रि को तंत्र-मंत्र की साधना के लिए अतिउपयुक्त माना गया है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार गुप्त नवरात्रि की भांति शाकंभरी नवरात्रि का भी बड़ा महत्व है।
इन दिनों साधक वनस्पति की देवी मां शाकंभरी की आराधना करेंगे। मां शाकंभरी ने अपने शरीर से उत्पन्न शाक-सब्जियों, फल-मूल आदि से संसार का भरण-पोषण किया था। इसी कारण माता ‘शाकंभरी’ नाम से विख्यात हुईं। ये मां ही माता अन्नपूर्णा, वैष्णो देवी, चामुंडा, कांगड़ा वाली, ज्वाला, चिंतपूर्णी, कामाख्या, चंडी, बाला सुंदरी, मनसा और नैना देवी कहलाती है।
शाकम्भरी नवरात्रि क्या है ?
शाकम्भरी नवरात्रि का आरंभ पौष शुक्ल अष्टमी से होता है।
समापन पौष पूर्णिमा को होता है।
इसी दिन माँ शाकम्भरी जयंती भी मनाई जाती है।
यह नवरात्रि तंत्र-साधना और गुप्त साधना के लिए अत्यंत श्रेष्ठ मानी जाती है।
माँ शाकम्भरी कौन हैं ?
माँ शाकम्भरी, आदिशक्ति जगदम्बा का सौम्य अवतार हैं।
इन्होंने अकाल के समय अपने शरीर से शाक, फल, कंद-मूल उत्पन्न कर संसार का पालन किया था।
इसी कारण इन्हें शाकम्भरी – अन्नपूर्णा स्वरूपा कहा गया।
शाकम्भरी नवरात्रि का महत्व
- धन-धान्य की वृद्धि
- घर में अन्न का भंडार
- रोग नाश
- विवाह में आ रही बाधा समाप्त
- तंत्र-मंत्र साधना में सिद्धि
- दुर्भिक्ष और कष्टों से मुक्ति
पौराणिक कथा – शाकम्भरी देवी का प्राकट्य
प्राचीन काल में दुर्गम नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य था।
उसने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या कर चारों वेद प्राप्त कर लिए।
वेदों के बल से वह अमर समान शक्तिशाली बन गया।
दुर्गम ने देवताओं की पूजा अपने नाम करवा ली।
उसके अत्याचार से पृथ्वी पर भयंकर सूखा पड़ा।
लगातार सौ वर्षों तक वर्षा नहीं हुई।
चारों ओर अकाल और त्राहि-त्राहि मच गई।
ऋषि, मुनि और ब्राह्मण हिमालय पर्वत पर गए।
उन्होंने जगदम्बा की कठोर तपस्या की।
तब भगवती पार्वती भुवनेश्वरी रूप में प्रकट हुईं।
माता ने अपने शरीर से शाक, फल, कंद-मूल और जड़ी-बूटियां उत्पन्न कीं।
उन्होंने संसार का भरण-पोषण किया।
इसी कारण माता “शाकम्भरी” कहलाईं।
माता की असंख्य आँखों से नौ दिन तक जलधारा बहती रही।
उस जल से पृथ्वी पर वर्षा हुई।
इसलिए उन्हें सताक्षी देवी भी कहा गया।
इसके बाद माँ ने दुर्गम दैत्य से युद्ध किया।
अपने बाणों से उसका संहार किया।
देवताओं को वेद और शक्तियां वापस दिलाईं।
इसी से माता दुर्गा नाम से भी प्रसिद्ध हुईं।
शाकम्भरी देवी ध्यान मंत्र
शाकम्भरी नीलवर्णा नीलोत्पलविलोचना।
गम्भीरनाभिस्त्रवलीविभूषिततनूदरी॥
शाकम्भरी नवरात्रि पूजा विधि
पौष शुक्ल अष्टमी को स्नान करें।
गणेश पूजन करें।
माँ शाकम्भरी का ध्यान करें।
देवी की तस्वीर स्थापित करें।
चारों ओर ताजे फल और सब्जियां रखें।
लौकी, कद्दू, शाक, फल अर्पित करें।
आरती करें।
पूर्णिमा तक यह पूजन करें।
विशेष उपाय (धन-धान्य हेतु)
पंचोपचार पूजन करें।
देवी के चित्र पर लौकी का भोग लगाएं।
यह उपाय धन-धान्य और घर की समृद्धि बढ़ाता है।
विवाह बाधा निवारण स्तुति
जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी॥
जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥
नहिं तब आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥
भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥
सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी॥
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥
मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें॥
(सिद्ध पार्वती स्तुति यहाँ विशेष फलदायी मानी जाती है। इसे 108 दिन तक पढ़ने से विवाह योग बनता है।)
शाकम्भरी देवी के प्रमुख शक्तिपीठ
सकराय – सीकर, राजस्थान
सांभर – राजस्थान
सहारनपुर – उत्तर प्रदेश
शाकम्भरी देवी की आरती
हरि ॐ श्री शाकुम्भरी अम्बाजी की आरती कीजो
ऐसी अद्भुत रूप हृदय धर लीजो
शताक्षी दयालु की आरती कीजो
तुम परिपूर्ण आदि भवानी मां, सब घट तुम आप बखानी मां
शाकुम्भरी अम्बाजी की आरती कीजो
तुम्हीं हो शाकुम्भर, तुम ही हो सताक्षी मां
शिवमूर्ति माया प्रकाशी मां,
शाकुम्भरी अम्बाजी की आरती कीजो
नित जो नर-नारी अम्बे आरती गावे मां
इच्छा पूर्ण कीजो, शाकुम्भर दर्शन पावे मां
शाकुम्भरी अम्बाजी की आरती कीजो
जो नर आरती पढ़े पढ़ावे मां, जो नर आरती सुनावे मां
बस बैकुंठ शाकुम्भर दर्शन पावे
शाकुम्भरी अंबाजी की आरती कीजो।
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FAQs
Q. शाकम्भरी नवरात्रि क्यों मनाई जाती है ?
अकाल और धन-धान्य संकट से रक्षा हेतु।
Q. किसे यह व्रत करना चाहिए ?
धन, विवाह और संतान सुख चाहने वाले।
Q. क्या लौकी का भोग जरूरी है ?
हाँ, यह विशेष फलदायी माना गया है।
डिसक्लेमर
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