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सोलह सोमवार व्रत विधि, कथा एवं उद्यापन विधि 2026 | संपूर्ण शिव पूजा विधि

सोलह सोमवार व्रत विधि, कथा एवं उद्यापन विधि | संपूर्ण पूजा विधि, संकल्प और महत्व

सोलह सोमवार व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने वाला अत्यंत फलदायी व्रत माना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त करने, वैवाहिक जीवन की समस्याओं को दूर करने, संतान सुख, परिवार में सुख-समृद्धि तथा मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि स्वयं माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए इस व्रत का पालन किया था। इसलिए इस व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। सोलह सोमवार व्रत का आरंभ प्रायः

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से करना शुभ माना जाता है। यदि किसी वर्ष महाशिवरात्रि सोमवार को पड़े, तो उस दिन से भी व्रत प्रारंभ किया जा सकता है। यह व्रत लगातार 16 सोमवार तक श्रद्धा और नियमपूर्वक किया जाता है तथा 17वें सोमवार को विधिवत उद्यापन किया जाता है। आइए जानते हैं सोलह सोमवार व्रत की संपूर्ण पूजा विधि, संकल्प, कथा और उद्यापन विधि।

सोलह सोमवार व्रत का महत्व

सोलह सोमवार व्रत विशेष रूप से विवाहित जीवन में परेशानियों का सामना करने वाले लोगों के लिए किया जाता है। यह व्रत अच्छे एवं मनोवांछित जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए भी अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इस व्रत का प्रारंभ स्वयं माता पार्वती ने किया था। जब उन्होंने पृथ्वी पर अवतार लिया, तब भगवान शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या, सोमवार व्रत और शिव पूजन किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पुनः स्वीकार किया। तभी से यह व्रत अत्यंत फलदायी माना जाता है।

16 सोमवार व्रत कब प्रारंभ करें ?

सोलह सोमवार व्रत पूजा सामग्री

सोलह सोमवार व्रत संकल्प

किसी भी पूजा या व्रत को आरंभ करने से पहले संकल्प अवश्य करना चाहिए। संकल्प केवल पहले सोमवार को किया जाता है। इसके बाद नियमित रूप से व्रत और पूजा की जाती है। हाथ में जल, अक्षत, पान का पत्ता, सुपारी तथा कुछ सिक्के लेकर निम्न संकल्प मंत्र का उच्चारण करें।

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः।
श्री मद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य
श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे
वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे
जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गत
ब्रह्मावर्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे बौद्धावतारे वर्तमाने
यथानामसंवत्सरे अमुकामने महामांगल्यप्रदे
अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे
अमुकनक्षत्रे शुभयोगे शुभकरणे
अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुक नाम अहं
अमुक कार्यसिद्ध्यर्थं सोलह सोमवार व्रत प्रारम्भ करिष्ये।

संकल्प के बाद हाथ में रखी सभी सामग्री भगवान शिव के चरणों में अर्पित करें और श्रद्धापूर्वक उनका ध्यान करें।

भगवान शिव का आवाहन

हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर भगवान शिव का आवाहन करें।

ऊँ शिवशंकरमीशानं द्वादशार्द्धं त्रिलोचनम्।

उमासहितं देवं शिवं आवाहयाम्यहम्॥

1. हाथ में लिये हुए फूल और अक्षत शिव भगवान को समर्पित करें।

2. सबसे पहले भगवान शिव पर जल समर्पित करें।

3. जल के बाद सफेद वस्त्र समर्पित करें।

4. सफेद चंदन से भगवान को तिलक लगायें एवं तिलक पर अक्षत लगायें।

5. सफेद पुष्प, धतुरा, बेल-पत्र, भांग एवं पुष्पमाला अर्पित करें।

6. अष्टगंध, धूप अर्पित कर, दीप दिखायें।

7. भगवान को भोग के रूप में ऋतु फल या बेल और नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद सोमवार व्रत कथा को पढ़े अथवा सुने।

सोलह सोमवार व्रत पूजा विधि

अब श्रद्धापूर्वक सोलह सोमवार व्रत कथा का पाठ या श्रवण करें।

सोलह सोमवार व्रत कथा 

प्राचीन समय की बात है। एक बार भगवान शिव और माता पार्वती मृत्यु लोक का भ्रमण करते हुए विदर्भ देश के अमरावती नगर पहुँचे। वहाँ एक अत्यंत सुंदर और पवित्र शिव मंदिर था। मंदिर की दिव्यता और पवित्रता से प्रसन्न होकर भगवान शिव और माता पार्वती कुछ समय के लिए वहीं निवास करने लगे।

एक दिन माता पार्वती ने भगवान शिव से प्रेमपूर्वक चौसर खेलने का आग्रह किया। भगवान शिव उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए चौसर खेलने के लिए तैयार हो गए। उसी समय मंदिर का पुजारी प्रतिदिन की भाँति आरती करने के लिए मंदिर में पहुँचा।

माता पार्वती ने पुजारी से पूछा, “बताओ, इस चौसर के खेल में हम दोनों में कौन विजयी होगा?” पुजारी भगवान शिव का अनन्य भक्त था। उसने बिना किसी विचार के उत्तर दिया, “महादेव ही विजयी होंगे।”

किन्तु जब चौसर का खेल समाप्त हुआ, तब भगवान शिव पराजित हुए और माता पार्वती विजयी हुईं। यह देखकर माता पार्वती क्रोधित हो गईं। भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि यह केवल खेल और भाग्य का परिणाम है, पुजारी का इसमें कोई दोष नहीं है। फिर भी माता पार्वती के मुख से श्राप निकल गया और पुजारी को तत्काल कुष्ठ रोग हो गया।

पुजारी ने किया सोलह सोमवार व्रत 

समय बीतता गया। पुजारी अत्यंत कष्ट के साथ अपना जीवन व्यतीत करने लगा। एक दिन एक दिव्य अप्सरा भगवान शिव की पूजा करने उस मंदिर में आई। उसने पुजारी की दयनीय अवस्था देखी और उसके रोग का कारण पूछा। पुजारी ने पूरी घटना विस्तार से सुना दी।

अप्सरा ने करुणा से भरकर कहा, “यदि तुम श्रद्धा और नियमपूर्वक सोलह सोमवार व्रत करोगे तो भगवान शिव की कृपा से तुम्हारा यह रोग अवश्य दूर हो जाएगा।”

पुजारी ने विनम्रतापूर्वक व्रत की विधि पूछी। अप्सरा ने बताया कि सोमवार के दिन स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करो। आधा किलो गेहूँ के आटे को घी में भूनकर उसमें गुड़ मिलाकर पंजीरी (अंगा) तैयार करो। उसके तीन भाग कर लो। प्रदोष काल में भगवान शिव का पूजन करो। एक भाग भगवान शिव को अर्पित करो, दूसरा भाग उपस्थित भक्तों में प्रसाद के रूप में बाँट दो और तीसरा भाग स्वयं ग्रहण करो। इस प्रकार लगातार सोलह सोमवार तक यही नियम अपनाओ। सत्रहवें सोमवार को गेहूँ के आटे का चूरमा बनाकर भगवान शिव को भोग लगाओ और प्रसाद वितरित करो।

पुजारी ने पूरी श्रद्धा और नियम के साथ सोलह सोमवार व्रत किया। भगवान शिव की कृपा से उसका कुष्ठ रोग पूर्णतः समाप्त हो गया और वह पहले की भाँति स्वस्थ एवं प्रसन्न रहने लगा।

कुछ समय बाद भगवान शिव और माता पार्वती पुनः उसी मंदिर में आए। उन्होंने पुजारी को पूर्णतः स्वस्थ देखकर आश्चर्य व्यक्त किया। माता पार्वती ने उससे पूछा कि उसे यह आरोग्य कैसे प्राप्त हुआ। पुजारी ने विनम्रता से सोलह सोमवार व्रत का पूरा महत्व और उसकी विधि बताई।

माता पार्वती और कार्तिकेय पर व्रत का प्रभाव

सोलह सोमवार व्रत की महिमा सुनकर माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने भी इस व्रत का पालन किया। भगवान शिव की कृपा से उनका पुत्र कार्तिकेय, जो किसी कारणवश उनसे दूर हो गया था, पुनः उनके पास लौट आया और आज्ञाकारी बन गया।

जब कार्तिकेय ने अपनी माता से इस परिवर्तन का कारण पूछा, तब माता पार्वती ने उन्हें सोलह सोमवार व्रत का महत्व बताया। यह सुनकर कार्तिकेय ने भी अपने विदेश गए ब्राह्मण मित्र से मिलने की इच्छा से यह व्रत किया। व्रत पूर्ण होने पर उनका मित्र स्वयं विदेश से लौटकर उनके पास आ गया।

ब्राह्मण मित्र ने आश्चर्य से पूछा कि यह कैसे संभव हुआ। तब कार्तिकेय ने सोलह सोमवार व्रत की महिमा बताई। यह सुनकर उस ब्राह्मण ने भी उत्तम पत्नी की प्राप्ति के लिए इस व्रत का संकल्प लिया।

उसी समय एक राजा अपनी पुत्री के विवाह की तैयारी कर रहा था। अनेक राजकुमार स्वयंवर में उपस्थित हुए। राजा ने घोषणा की कि जिसकी गर्दन में हथिनी वरमाला डालेगी, उसी से राजकुमारी का विवाह होगा। संयोगवश हथिनी ने उस ब्राह्मण के गले में ही वरमाला डाल दी। राजा ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार राजकुमारी का विवाह उस ब्राह्मण से कर दिया।

ब्राह्मण को मिला राजकुमारी का वरदान 

विवाह के कुछ समय बाद एक दिन राजकुमारी ने अपने पति से पूछा, “स्वामी! आपने ऐसा कौन-सा पुण्य किया था कि अनेक राजकुमारों के रहते हुए भी हथिनी ने आपके ही गले में वरमाला डाली?” तब ब्राह्मण ने उत्तर दिया, “प्रिये! मैंने अपने मित्र कार्तिकेय के कहने पर श्रद्धापूर्वक सोलह सोमवार व्रत किया था। उसी व्रत के पुण्य प्रभाव से मुझे तुम्हारे जैसी गुणवती पत्नी प्राप्त हुई है।”

यह सुनकर राजकुमारी ने भी पुत्र प्राप्ति की कामना से सोलह सोमवार व्रत का संकल्प लिया। भगवान शिव की कृपा से समय आने पर उसे एक तेजस्वी और सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। जब वह बालक बड़ा हुआ तो उसने अपनी माता से पूछा, “माता! आपको मेरे जैसा पुत्र किस पुण्य के कारण प्राप्त हुआ?” तब राजकुमारी ने उसे भी सोलह सोमवार व्रत की महिमा बताई।

बालक ने भी उत्तम राज्य और यश की प्राप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक सोलह सोमवार व्रत किया। उसी समय एक राजा अपनी पुत्री के लिए योग्य वर की तलाश कर रहा था। लोगों ने उस तेजस्वी ब्राह्मण पुत्र की प्रशंसा की। राजा ने उसे बुलाकर अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ कर दिया। कुछ वर्षों बाद राजा की मृत्यु हो गई। चूँकि उसका कोई पुत्र नहीं था, इसलिए वही ब्राह्मण पुत्र राज्य का उत्तराधिकारी बनकर राजा बन गया।

राजपाट मिलने के बाद भी वह प्रत्येक सोमवार को श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान शिव का व्रत करता रहा। जब सत्रहवें सोमवार का दिन आया, तब उसने अपनी पत्नी से कहा कि वह भी उसके साथ शिव मंदिर चलकर पूजा में सम्मिलित हो। किन्तु राजकुमारी स्वयं न जाकर अपनी दासी को भेज दिया।

राजकुमारी की परीक्षा और व्रत का चमत्कार

पूजा समाप्त होने के बाद आकाशवाणी हुई— “राजन! अपनी पत्नी को कुछ समय के लिए महल से दूर कर दो, अन्यथा तुम्हारे राज्य और जीवन पर संकट आ जाएगा।” यह सुनकर राजा अत्यंत दुःखी हुआ। उसने दरबारियों से परामर्श किया, किन्तु अंततः भगवान की आज्ञा मानकर भारी मन से अपनी पत्नी को महल से बाहर भेज दिया।

राजकुमारी दुःखी मन से एक नगर में पहुँची। वहाँ एक वृद्धा धागा बेचने जा रही थी। उसने दया करके राजकुमारी को अपने साथ काम पर लगा लिया। परंतु थोड़ी दूर चलते ही तेज आँधी आई और धागों की टोकरी उड़ गई। वृद्धा ने इसे अशुभ मानकर राजकुमारी को वहाँ से जाने के लिए कह दिया।

इसके बाद वह एक तेली के घर पहुँची। जैसे ही वह वहाँ पहुँची, तेल के सभी घड़े फूट गए और सारा तेल बह गया। तेली ने भी उसे मनहूस समझकर अपने घर से निकाल दिया।

भूखी-प्यासी राजकुमारी एक तालाब के किनारे पहुँची। जैसे ही उसने पानी पीना चाहा, पानी में कीड़े दिखाई देने लगे और पानी गंदला हो गया। वह अत्यंत दुःखी होकर एक पेड़ के नीचे जाकर बैठ गई। उसके बैठते ही पेड़ की सारी पत्तियाँ झड़ गईं। इसके बाद वह जिस भी वृक्ष के नीचे जाती, उसकी पत्तियाँ सूखकर गिर जाती थीं।

यह देखकर आसपास के लोगों ने मंदिर के पुजारी को बुलाया। पुजारी ने राजकुमारी की पूरी व्यथा सुनी और करुणा से भरकर उसे अपने आश्रम में रहने का स्थान दिया। लेकिन वहाँ भी जब वह भोजन बनाती या पानी लाती, तो उसमें कीड़े पड़ जाते। पुजारी ने भगवान शिव का ध्यान किया और दिव्य ज्ञान से समझ गया कि यह सब शिव पूजा में हुई भूल का परिणाम है।

पुजारी ने राजकुमारी से कहा, “बेटी! तुम श्रद्धा और नियमपूर्वक सोलह सोमवार व्रत करो। भगवान शिव अवश्य तुम्हारे सभी कष्ट दूर करेंगे।”

व्रत का फल और कथा का समापन

राजकुमारी ने पूरे विश्वास और भक्ति के साथ सोलह सोमवार व्रत किया। सत्रहवें सोमवार के दिन उधर राजा को अपनी पत्नी की याद आने लगी। उसने तुरंत अपने सेवकों को उसकी खोज में भेजा। खोजते-खोजते वे उसी आश्रम में पहुँचे जहाँ राजकुमारी रह रही थी।

सेवकों ने पुजारी से राजकुमारी को साथ ले जाने की अनुमति माँगी। पुजारी ने कहा, “यदि राजा स्वयं आकर सम्मानपूर्वक अपनी पत्नी को ले जाए, तभी मैं इसे भेजूँगा।”

राजा स्वयं आश्रम पहुँचा। उसने पुजारी का आशीर्वाद लिया, अपनी पत्नी से क्षमा माँगी और बड़े सम्मान के साथ उसे वापस महल ले आया। इसके बाद दोनों ने मिलकर भगवान शिव की भक्ति और सोलह सोमवार व्रत का पालन किया। उनके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और वैभव की कभी कमी नहीं रही।

इस प्रकार जो भी श्रद्धा, विश्वास और नियमपूर्वक सोलह सोमवार व्रत करता है तथा भगवान शिव का स्मरण करता है, उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और उसे सुख, सौभाग्य, आरोग्य तथा समृद्धि की प्राप्ति होती है।

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महादेव जी की आरती 

ॐ जय गंगाधर जय हर जय गिरिजाधीशा।

त्वं मां पालय नित्यं कृपया जगदीशा॥ हर…॥

कैलासे गिरिशिखरे कल्पद्रमविपिने।

गुंजति मधुकरपुंजे कुंजवने गहने॥

कोकिलकूजित खेलत हंसावन ललिता।

रचयति कलाकलापं नृत्यति मुदसहिता ॥ हर…॥

तस्मिंल्ललितसुदेशे शाला मणिरचिता।

तन्मध्ये हरनिकटे गौरी मुदसहिता॥

क्रीडा रचयति भूषारंचित निजमीशम्‌।

इंद्रादिक सुर सेवत नामयते शीशम्‌ ॥ हर…॥

बिबुधबधू बहु नृत्यत नामयते मुदसहिता।

किन्नर गायन कुरुते सप्त स्वर सहिता॥

धिनकत थै थै धिनकत मृदंग वादयते।

क्वण क्वण ललिता वेणुं मधुरं नाटयते ॥हर…॥

रुण रुण चरणे रचयति नूपुरमुज्ज्वलिता।

चक्रावर्ते भ्रमयति कुरुते तां धिक तां॥

तां तां लुप चुप तां तां डमरू वादयते।

अंगुष्ठांगुलिनादं लासकतां कुरुते ॥ हर…॥

कपूर्रद्युतिगौरं पंचाननसहितम्‌।

त्रिनयनशशिधरमौलिं विषधरकण्ठयुतम्‌॥

सुन्दरजटायकलापं पावकयुतभालम्‌।

डमरुत्रिशूलपिनाकं करधृतनृकपालम्‌ ॥ हर…॥

मुण्डै रचयति माला पन्नगमुपवीतम्‌।

वामविभागे गिरिजारूपं अतिललितम्‌॥

सुन्दरसकलशरीरे कृतभस्माभरणम्‌।

इति वृषभध्वजरूपं तापत्रयहरणं ॥ हर…॥

शंखनिनादं कृत्वा झल्लरि नादयते।

नीराजयते ब्रह्मा वेदऋचां पठते॥

अतिमृदुचरणसरोजं हृत्कमले धृत्वा।

अवलोकयति महेशं ईशं अभिनत्वा॥ हर…॥

ध्यानं आरति समये हृदये अति कृत्वा।

रामस्त्रिजटानाथं ईशं अभिनत्वा॥

संगतिमेवं प्रतिदिन पठनं यः कुरुते।

शिवसायुज्यं गच्छति भक्त्या यः श्रृणुते ॥ हर…॥

त्रिदेवो की आरती 

ॐ जय शिव ओंकारा….

एकानन चतुरानन पंचांनन राजे।

हंसासंन, गरुड़ासन, वृषवाहन साजे॥

ॐ जय शिव ओंकारा…

दो भुज चारु चतुर्भज दस भुज अति सोहें।

तीनों रुप निरखता त्रिभुवन जन मोहें॥

ॐ जय शिव ओंकारा…

अक्षमाला, बनमाला, रुण्ड़मालाधारी।

चंदन, मृदमग सोहें, भाले शशिधारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा….

श्वेताम्बर,पीताम्बर, बाघाम्बर अंगें।

सनकादिक, ब्रम्हादिक, भूतादिक संगें।।

ॐ जय शिव ओंकारा…

कर के मध्य कमड़ंल चक्र, त्रिशूल धरता।

जगकर्ता, जगभर्ता, जगसंहारकर्ता॥

ॐ जय शिव ओंकारा…

ब्रम्हा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

प्रवणाक्षर मध्यें ये तीनों एका॥

ॐ जय शिव ओंकारा…

काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रम्हचारी।

नित उठी भोग लगावत महिमा अति भारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा…

त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावें|

कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावें॥

ॐ जय शिव ओंकारा…

जय शिव ओंकारा हर ॐ शिव ओंकारा|

ब्रम्हा विष्णु सदाशिव अद्धांगी धारा॥

ॐ जय शिव ओंकारा।

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16 सोमवार व्रत उद्यापन विधि

सोलह सोमवार व्रत का उद्यापन 17वें सोमवार को किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार श्रावण मास के प्रथम अथवा तृतीय सोमवार को उद्यापन करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यदि यह संभव न हो तो कार्तिक, वैशाख, ज्येष्ठ अथवा मार्गशीर्ष मास के किसी भी सोमवार को विधिपूर्वक उद्यापन किया जा सकता है। उद्यापन के दिन भगवान शिव, माता पार्वती (उमा-महेश) तथा चन्द्रदेव का संयुक्त रूप से पूजन और हवन करने का विधान है।

उद्यापन की तैयारी

पूजन विधि

कलश स्थापना के पश्चात पंचाक्षर मंत्र “ॐ नमः शिवाय” का जप करते हुए भगवान शिव का आवाहन करें। इसके बाद माता पार्वती एवं चन्द्रदेव का भी विधिपूर्वक पूजन करें।

पंचामृत स्नान एवं हवन

पूजन के उपरांत भगवान शिव का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद एवं शक्कर) से अभिषेक करें। इसके बाद शुद्ध जल से स्नान कराकर नवीन वस्त्र एवं चंदन अर्पित करें। श्रद्धापूर्वक पंचाक्षर मंत्र एवं शिव मंत्रों के साथ हवन करें।

दान एवं ब्राह्मण भोजन

हवन पूर्ण होने के बाद आचार्य अथवा योग्य ब्राह्मण को दक्षिणा, वस्त्र, आभूषण (श्रद्धानुसार) एवं पूजन सामग्री अर्पित करें। शास्त्रों में सामर्थ्य अनुसार गौदान का भी विशेष महत्व बताया गया है। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें तथा अंत में स्वयं एवं परिवार सहित प्रसाद ग्रहण करें।

उद्यापन के पश्चात भगवान शिव की आरती अवश्य करें तथा सभी श्रद्धालुओं में प्रसाद वितरित करें।

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सोलह सोमवार व्रत से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. सोलह सोमवार व्रत कब से शुरू करना चाहिए ?

सोलह सोमवार व्रत का आरंभ श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से करना सबसे शुभ माना जाता है। यदि किसी वर्ष महाशिवरात्रि सोमवार को पड़े, तो उस दिन से भी व्रत प्रारंभ किया जा सकता है।

Q2. क्या महिलाएं और पुरुष दोनों सोलह सोमवार व्रत कर सकते हैं ?

हाँ। यह व्रत स्त्री और पुरुष दोनों कर सकते हैं। श्रद्धा, नियम और भगवान शिव के प्रति सच्ची भक्ति इस व्रत का सबसे महत्वपूर्ण आधार है।

Q3. सोलह सोमवार व्रत में क्या खाना चाहिए ?

व्रत के दौरान सात्विक भोजन करें। फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, सिंघाड़े का आटा तथा व्रत में मान्य खाद्य पदार्थ ग्रहण किए जा सकते हैं।

Q4. सोलह सोमवार व्रत का उद्यापन कब किया जाता है ?

लगातार 16 सोमवार पूरे होने के बाद 17वें सोमवार को विधिपूर्वक भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा, हवन, दान तथा ब्राह्मण भोजन के साथ उद्यापन किया जाता है।

Q5. क्या सोलह सोमवार व्रत से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं ?

धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रद्धा और नियमपूर्वक किए गए सोलह सोमवार व्रत से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है तथा विवाह, सुख-समृद्धि और अन्य शुभ मनोकामनाओं की पूर्ति का आशीर्वाद मिलता है।

निष्कर्ष

सोलह सोमवार व्रत भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने वाला अत्यंत पवित्र और फलदायी व्रत माना जाता है। श्रद्धा, नियम और सच्ची भक्ति के साथ इस व्रत का पालन करने से भगवान शिव एवं माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी हो, तो इसे अपने परिवार और मित्रों के साथ अवश्य साझा करें ताकि अधिक से अधिक लोग इस पावन व्रत की सही विधि और महत्व जान सकें। हर हर महादेव!


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