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कल्कि अवतार: जानें भगवान विष्णु के अंतिम अवतार की पूजा विधि, महत्व

कल्कि जन्मोत्सव 2026: तिथि, समय, महत्व, पूजा विधि और मंत्र

कल्कि जन्मोत्सव 2026: हिन्दू धर्म में भगवान विष्णु के दशावतारों का विशेष महत्व है। पुराणिक ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु का कल्कि अवतार कलियुग के अंत में प्रकट होगा। कल्कि अवतार को भगवान विष्णु का भावी अवतार माना जाता है।

शास्त्रीय परंपरा के अनुसार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को कल्कि जयंती या कल्कि जन्मोत्सव मनाया जाता है। वर्ष 2026 में कल्कि जयंती 18 अगस्त, मंगलवार को मनाई जाएगी। इस दिन श्रावण शुक्ल षष्ठी तिथि है।

भगवान कल्कि के प्राकट्य का वर्णन वर्तमान समय की घटना के रूप में नहीं, बल्कि कलियुग के अंत में होने वाले भावी अवतार के रूप में मिलता है। इसलिए कल्कि जयंती को भगवान कल्कि के भावी प्राकट्य की स्मृति और आराधना के पर्व के रूप में समझना उचित है।

कल्कि जयंती 2026 कब है ?

वर्ष 2026 में कल्कि जयंती 18 अगस्त 2026, मंगलवार को मनाई जाएगी। यह दिन श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि से संबंधित है।

तिथि: 18 अगस्त 2026, मंगलवार

पक्ष: श्रावण शुक्ल पक्ष

तिथि: षष्ठी

पर्व: कल्कि जयंती / कल्कि जन्मोत्सव

पूजा का सटीक मुहूर्त स्थान और स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग हो सकता है। इसलिए पूजा के लिए अपने क्षेत्र के पंचांग के अनुसार समय देखना उचित रहेगा।

भगवान कल्कि कौन हैं ?

भगवान कल्कि को हिन्दू धर्म की पुराणिक परंपरा में भगवान विष्णु का भावी अवतार माना गया है। श्रीमद्भागवत महापुराण में कलियुग के अंत में भगवान कल्कि के प्राकट्य का वर्णन मिलता है।

श्रीमद्भागवत के अनुसार कलियुग के अंतिम समय में जब धर्म का अत्यधिक ह्रास होगा और अधर्म बढ़ जाएगा, तब भगवान विष्णु कल्कि रूप में प्रकट होंगे। उनके प्राकट्य का उद्देश्य अधर्म का नाश और धर्म की पुनर्स्थापना बताया गया है।

भगवान कल्कि को भगवान विष्णु के दशावतारों में अंतिम अवतार माना जाता है। नौ अवतारों के प्राकट्य के बाद कल्कि अवतार का प्राकट्य भविष्य में होना बताया गया है।

कल्कि अवतार कब होगा ?

पुराणिक ग्रंथों के अनुसार भगवान कल्कि का अवतार कलियुग के अंत में होगा। श्रीमद्भागवत महापुराण में कल्कि के प्राकट्य का वर्णन भविष्यकालीन रूप में किया गया है।

इसलिए वर्तमान समय में भगवान कल्कि के पृथ्वी पर प्रकट हो जाने की बात को निश्चित शास्त्रीय तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।

कलियुग का अंत और सतयुग का प्रारंभ

पुराणिक कालगणना के अनुसार कलियुग की अवधि पूरी होने के बाद युग परिवर्तन का वर्णन मिलता है। भगवान कल्कि के प्राकट्य के बाद अधर्म का नाश और धर्म की पुनर्स्थापना होने की बात पुराणों में कही गई है। इसके बाद सतयुग के प्रारंभ का वर्णन मिलता है।

इस प्रकार भगवान कल्कि का अवतार धर्म की पुनर्स्थापना और युग परिवर्तन से जुड़ा हुआ माना जाता है।

कलियुग की आयु कितनी है ?

हिन्दू धर्मग्रंथों और पुराणिक कालगणना के अनुसार कलियुग की कुल अवधि 4,32,000 मानव वर्ष मानी गई है। श्रीमद्भागवत महापुराण में भी कलियुग की अवधि का वर्णन मिलता है।

पारंपरिक हिन्दू कालगणना के अनुसार वर्तमान कलियुग का आरंभ 3102 ईसा पूर्व माना जाता है। इस गणना के आधार पर 17 अगस्त 2026 तक कलियुग के लगभग 5,127 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं और 5128वाँ वर्ष चल रहा है।

अर्थात् कलियुग की कुल अवधि 4,32,000 वर्षों में से लगभग 5,127 वर्ष बीत चुके हैं, जबकि लगभग 4,26,873 वर्ष शेष हैं।

कलियुग की यह अवधि अत्यंत लंबी मानी गई है। इसलिए पारंपरिक हिन्दू कालगणना के अनुसार कलियुग की समाप्ति अभी बहुत दूर है।

नोट: कलियुग के आरंभ और वर्ष-संख्या की गणना पारंपरिक हिन्दू कालगणना पर आधारित है। अलग-अलग पंचांग एवं गणना-पद्धतियों में वर्ष-संख्या को प्रस्तुत करने में थोड़ा अंतर मिल सकता है।

कल्कि अवतार का शास्त्रीय वर्णन

श्रीमद्भागवत महापुराण के द्वादश स्कंध के द्वितीय अध्याय में भगवान कल्कि के प्राकट्य का वर्णन मिलता है। इसमें बताया गया है कि कलियुग के अंत में भगवान कल्कि शम्भल ग्राम में विष्णुयश नामक श्रेष्ठ ब्राह्मण के घर प्रकट होंगे।

भगवान कल्कि के हाथ में तलवार और उनके वाहन के रूप में देवदत्त नामक अश्व का वर्णन मिलता है। उनके प्राकट्य के बाद अधर्म का नाश और सतयुग के प्रारंभ का वर्णन किया गया है।

भगवान कल्कि के पिता का नाम

श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार भगवान कल्कि के पिता का नाम विष्णुयश होगा।

कल्कि पुराण की परंपरा में भगवान कल्कि की माता का नाम सुमति बताया जाता है।

भगवान कल्कि के गुरु कौन होंगे ?

कल्कि पुराण की परंपरा के अनुसार भगवान परशुराम भगवान कल्कि के गुरु होंगे। परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार भी माना जाता है।

कल्कि पुराण की कथाओं में भगवान कल्कि की शिक्षा और अस्त्र-शस्त्र विद्या से संबंधित प्रसंग मिलते हैं।

भगवान कल्कि के घोड़े का नाम

पुराणिक परंपरा में भगवान कल्कि के श्वेत अश्व का नाम देवदत्त बताया जाता है। श्रीमद्भागवत में भी देवदत्त नामक अश्व का उल्लेख मिलता है।

भगवान कल्कि का स्वरूप

कल्कि का स्वरूप पुराणिक परंपरा में दिव्य और तेजस्वी बताया गया है। उन्हें अश्व पर सवार तथा हाथ में तलवार धारण किए हुए स्वरूप में चित्रित किया जाता है।

भगवान कल्कि के स्वरूप से जुड़े अनेक विस्तृत विवरण कल्कि पुराण और अन्य परंपरागत ग्रंथों में मिलते हैं। इसलिए इन विवरणों को संबंधित ग्रंथ की परंपरा के रूप में समझना चाहिए।

सम्भल

श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान कल्कि के प्राकट्य स्थान के रूप में शम्भल ग्राम का उल्लेख मिलता है।

शम्भल की वर्तमान भौगोलिक पहचान को लेकर अलग-अलग परंपराओं और मतों में अंतर पाया जाता है। इसलिए किसी एक आधुनिक स्थान को निश्चित रूप से वही शम्भल घोषित करना उचित नहीं है।

भगवान कल्कि जन्मोत्सव का धार्मिक महत्व

कल्कि जयंती भगवान विष्णु के भावी कल्कि स्वरूप के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का विशेष अवसर है। इस दिन भगवान विष्णु का स्मरण, पूजा, मंत्र-जप, व्रत और दान आदि धार्मिक कार्य किए जाते हैं।

भक्त इस दिन भगवान विष्णु से धर्म, सत्य, सदाचार और आत्मिक शक्ति की प्रार्थना करते हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान भी किया जा सकता है।

कल्कि जयंती के दिन क्या करें ?

Kalki Jayanti पर व्रत और पूजा

कल्कि जयंती के दिन श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार व्रत रखते हैं। भगवान विष्णु का स्मरण और पूजा करना इस दिन विशेष रूप से शुभ माना जाता है।

यदि स्वास्थ्य या अन्य कारणों से व्रत रखना संभव न हो तो भगवान का स्मरण, पूजा और सात्त्विक आहार भी किया जा सकता है।

श्रीकल्कि भगवान की पंचोपचार पूजा विधि

श्रीकल्कि जयंती के दिन आराधक स्वच्छ होकर पूजा स्थान पर उपस्थित हो। दुर्गाजी का विग्रह, श्रीयंत्र, पारद शिवलिंग, भगवान नारायण का विग्रह, मूर्ति, चित्र या शालग्राम में से जो उपलब्ध हो, अपने सामने रख सकता है। उसमें श्रीकल्कि भगवान के उपस्थित होने की भावना करके निम्न संक्षिप्त विधि से पूजन किया जा सकता है।

आचमन, पवित्रीकरण, शिखाबंधन और प्राणायाम करके श्रीकल्कि भगवान के पूजन का संकल्प करें।

ॐ श्रीगणेश-विष्णु-शिव-दुर्गा-सूर्येभ्यो नमः।

इस मंत्र से पंचदेवों को नमस्कार कर पुष्प अर्पित करें।

ॐ ऐं स्त्रौं कलि-दर्पघ्न्यै नमः।

ॐ ऐं वैं कलि-कल्मष-नाशिन्यै नमः।

इन मंत्रों से माता दुर्गा को नमस्कार करके पुष्प अर्पित करें। इसके बाद श्रीकल्कि भगवान का ध्यान करें।

भगवान कल्कि का ध्यान

ध्याये नील-हयारूढ़ं, श्वेतोष्णीष-विराजितम्।
महा-मुद्राढ्य-हस्तं च, कौस्तुभोद्दाम-कण्ठकम्॥
मर्दयन्तं म्लेच्छ-गणं, क्रोध-पूरित-लोचनम्।
अन्तर्हितैर्देव-मुनि-गन्धर्वै-संस्तुतं हरिम्॥१॥

अर्थात् नीले घोड़े पर सवार, श्वेत मुकुट से देदीप्यमान, महा-मुद्रा से युक्त तथा कौस्तुभ मणि से सुशोभित भगवान कल्कि का ध्यान किया जाता है। वे दुष्ट शक्तियों के विनाश के लिए क्रोधपूर्ण नेत्रों से युक्त बताए गए हैं और देव, मुनि तथा गंधर्व उनकी स्तुति करते हैं।

कल्पावसाने निखिलैः खुरैः स्वैः,
सङ्घट्टयामास निमेष-मात्रात्।
यस्तेजसा निर्दहतीति भीमो,
विश्वात्मकं तं तुरगं भजामः॥२॥

अर्थात् युग के अंत में अपने खुरों के प्रचंड वेग से संसार को प्रभावित करने वाले तथा अपने तेज से अत्यंत प्रभावशाली दिव्य अश्व का स्मरण किया जाता है।

म्लेच्छ-निवहनिधने कलयसि करवालम्।
धूमकेतुमिव किमपि करालम्॥
केशव धृतकल्किशरीर जय जगदीश हरे॥३॥

अर्थात् दुष्ट शक्तियों के विनाश के लिए धूमकेतु के समान भयंकर तलवार धारण करने वाले कल्कि स्वरूप भगवान केशव की जय हो।

ॐ श्रीकल्कि अवताराय नमः। ध्यानार्थे पुष्पाणि समर्पयामि॥

यह कहकर भगवान को पुष्प अर्पित करें।

गंध अर्पण

ॐ श्रीकल्कि अवताराय नमः।

लं पृथिव्यात्मकं गन्धं श्रीकल्किने समर्पयामि नमः।

यह कहकर भगवान को चंदन का तिलक करें।

पुष्प अर्पण

ॐ श्रीकल्कि अवताराय नमः।

हं आकाशात्मकं पुष्पं श्रीकल्किने समर्पयामि नमः।

यह कहकर भगवान को पुष्प अर्पित करें।

धूप अर्पण

ॐ श्रीकल्कि अवताराय नमः।

यं वाय्वात्मकं धूपं श्रीकल्किने आघ्रापयामि नमः।

यह कहकर धूप अर्पित करें।

दीप अर्पण

ॐ श्रीकल्कि अवताराय नमः।

रं वह्न्यात्मकं दीपं श्रीकल्किने दर्शयामि नमः।

यह कहकर भगवान को दीप दिखाएं।

नैवेद्य अर्पण

ॐ श्रीकल्कि अवताराय नमः।

वं अमृतात्मकं नैवेद्यं श्रीकल्किने निवेदयामि नमः।

यह कहकर भगवान को उत्तम सात्त्विक नैवेद्य अर्पित करें।

सर्वोपचार समर्पण

ॐ श्रीकल्कि अवताराय नमः।

सं सर्वात्मकं सर्वोपचाराणि श्रीकल्किने समर्पयामि नमः।

यह कहकर भगवान को पुष्प अर्पित करें और प्रदक्षिणा आदि समस्त उपचार श्रद्धापूर्वक समर्पित करने की भावना करें।

श्रीकल्कि अवतार नाम मंत्र की साधना विधि

श्रीकल्कि भगवान के नाम का स्मरण भक्तिभाव से किया जा सकता है। परंपरागत रूप से श्रीकल्कि नाम-मंत्र की साधना का भी वर्णन मिलता है।

करन्यास


कं अंगुष्ठाभ्यां नमः।
कं तर्जनीभ्यां स्वाहा।
ल्किं मध्यमाभ्यां वषट्।
नं अनामिकाभ्यां हुम्।
नं कनिष्ठाभ्यां वषट्।
मं करतल-कर-पृष्ठाभ्यां फट्।

षडङ्गन्यास


कं हृदयाय नमः।
कं शिरसे स्वाहा।
ल्किं शिखायै वषट्।
नं कवचाय हुम्।
नं नेत्रत्रयाय वौषट्।
मं अस्त्राय फट्।

ध्यान


ध्याये नील-हयारूढ़ं, श्वेतोष्णीष-विराजितम्।
महा-मुद्राढ्य-हस्तं च, कौस्तुभोद्दाम-कण्ठकम्॥
मर्दयन्तं म्लेच्छ-गणं, क्रोध-पूरित-लोचनम्।
अन्तर्हितैर्देव-मुनि-गन्धर्वै-संस्तुतं हरिम्॥

अर्थ: नीले घोड़े पर सवार, श्वेत मुकुट से देदीप्यमान और कौस्तुभ मणि से सुशोभित भगवान कल्कि का ध्यान किया जाता है। वे अधर्म के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए प्रकट होने वाले भगवान विष्णु के दिव्य स्वरूप हैं।

श्रीकल्कि भगवान की मानस पूजा

लं पृथिव्यात्मकं गन्धं श्रीकल्किने मनसा परिकल्प्य समर्पयामि नमः।

हं आकाशात्मकं पुष्पं श्रीकल्किने मनसा परिकल्प्य समर्पयामि नमः।

यं वाय्वात्मकं धूपं श्रीकल्किने मनसा परिकल्प्य आघ्रापयामि नमः।

रं वह्न्यात्मकं दीपं श्रीकल्किने मनसा परिकल्प्य दर्शयामि नमः।

वं अमृतात्मकं नैवेद्यं श्रीकल्किने मनसा परिकल्प्य निवेदयामि नमः।

सं सर्वात्मकं सर्वोपचाराणि श्रीकल्किने मनसा परिकल्प्य समर्पयामि नमः।

श्री कल्कि भगवान का मंत्र

॥ कं कल्किने नमः ॥

कल्कि भगवान के इस नाम-मंत्र का श्रद्धा और भक्तिभाव से जाप किया जा सकता है। मंत्र-जप की संख्या अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार रखें।

कल्कि मंत्र जप (कल्कि महामंत्र)

जय कल्कि जय जगत्पते, पद्मापति जय रमापते।

इस मंत्र में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का स्मरण किया जाता है। भक्तिभाव से इसका जाप भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा की प्रार्थना करते हुए किया जा सकता है।

इस मंत्र का जाप इन भावनाओं के साथ किया जा सकता है:

प्रार्थना

हे कल्कि भगवान! मैंने जो आपके महामंत्र का जाप किया, उसका संपूर्ण फल आपको समर्पित करता हूं। हे प्रभु! मेरे मन में धर्म, सत्य, सदाचार और भक्ति की भावना बढ़ाएं।

हे भगवान! धर्म, गौ, ब्राह्मण, सज्जन और समस्त प्राणियों की रक्षा करें। संसार में शांति और सद्भाव की स्थापना हो। सभी जीव सुखी रहें।

हे प्रभु! हमें सत्य के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें। हमारे जीवन से अज्ञान, अहंकार और अधर्म को दूर करें।

कल्कि बीज मंत्र

ॐ कोंग कल्कि देवाय नमः।

इस मंत्र का जाप भक्तिभाव से भगवान कल्कि के स्मरण के लिए किया जा सकता है। मंत्र की साधना करते समय योग्य गुरु या परंपरा से मार्गदर्शन लेना उचित है।

कल्कि बीज मंत्र प्रयोग

ॐ कोंग कल्कि देवाय नमः का जाप श्रद्धा और भक्तिभाव से भगवान कल्कि के स्मरण के लिए किया जा सकता है।

मंत्र-जप को आध्यात्मिक साधना के रूप में करें। किसी सांसारिक समस्या या स्वास्थ्य समस्या के लिए केवल मंत्र को उपचार का विकल्प न मानें।

कल्कि स्वास्थ्य मंत्र

हक् अनीह निष्कलंक गौरंडा: दुष्टहा: नाशनम् पापहा।

कल्कि स्वास्थ्य मंत्र प्रयोग

इस मंत्र का जाप भगवान के स्मरण और आध्यात्मिक साधना के रूप में किया जा सकता है।

यदि किसी व्यक्ति को कोई बीमारी या स्वास्थ्य संबंधी समस्या है तो मंत्र-जप के साथ योग्य चिकित्सक की सलाह और आवश्यक उपचार लेना भी जरूरी है।

कल्कि जयंती पर दान का महत्व

धार्मिक परंपरा में दान को पुण्यकारी माना गया है। कल्कि जयंती पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंद लोगों को भोजन, अन्न, वस्त्र या अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान किया जा सकता है।

ब्राह्मणों, साधु-संतों और जरूरतमंद लोगों को श्रद्धा के अनुसार भोजन कराना या दान देना भी धार्मिक परंपरा में शुभ माना जाता है।

कल्कि जयंती पर भगवान विष्णु की पूजा

कल्कि जयंती के दिन भगवान विष्णु का पूजन किया जा सकता है। भगवान विष्णु को पीले फूल, तुलसी दल, चंदन, धूप, दीप और सात्त्विक नैवेद्य अर्पित करें।

इसके बाद भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी कर सकते हैं।

कल्कि जयंती का संदेश

भगवान कल्कि की कथा हमें यह संदेश देती है कि अधर्म कितना भी बढ़ जाए, धर्म और सत्य का महत्व सदैव बना रहता है। इसलिए कल्कि अवतार की प्रतीक्षा के साथ हमें वर्तमान जीवन में भी सत्य, धर्म, करुणा और सदाचार का पालन करना चाहिए।

भगवान कल्कि से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q1. कल्कि जयंती 2026 में कब है ?

वर्ष 2026 में कल्कि जयंती 18 अगस्त 2026, मंगलवार को मनाई जाएगी। यह श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि से संबंधित है।

Q2. भगवान कल्कि कब प्रकट होंगे ?

पुराणिक ग्रंथों के अनुसार भगवान कल्कि कलियुग के अंत में प्रकट होंगे। वर्तमान समय में उनके प्राकट्य की निश्चित तारीख शास्त्रों में निर्धारित नहीं है।

Q3. भगवान कल्कि के पिता का नाम क्या है ?

श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार भगवान कल्कि के पिता का नाम विष्णुयश है।

Q4. भगवान कल्कि की माता का नाम क्या है?

कल्कि पुराण की परंपरा के अनुसार भगवान कल्कि की माता का नाम सुमति बताया जाता है।

Q5. भगवान कल्कि के गुरु कौन हैं?

कल्कि पुराण की परंपरा में भगवान परशुराम को भगवान कल्कि का गुरु बताया गया है।

Q6. भगवान कल्कि के घोड़े का नाम क्या है?

पुराणिक परंपरा में भगवान कल्कि के श्वेत अश्व का नाम देवदत्त बताया जाता है।

Q7. कलियुग की कुल आयु कितनी है?

पुराणिक हिन्दू कालगणना के अनुसार कलियुग की कुल अवधि 4,32,000 मानव वर्ष मानी गई है।

Q8. क्या भगवान कल्कि अभी प्रकट हो चुके हैं?

शास्त्रीय पुराणिक वर्णन भगवान कल्कि के प्राकट्य को कलियुग के अंत से जोड़ता है। इसलिए वर्तमान समय में भगवान कल्कि के प्रकट हो जाने का निश्चित दावा करना उचित नहीं है।

Q9. भगवान कल्कि का प्राकट्य कहाँ होगा?

श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान कल्कि के प्राकट्य स्थान के रूप में शम्भल ग्राम का उल्लेख मिलता है। शम्भल की आधुनिक भौगोलिक पहचान को लेकर अलग-अलग मत हैं।

निष्कर्ष

भगवान कल्कि हिन्दू धर्म की पुराणिक परंपरा में भगवान विष्णु के भावी अवतार माने जाते हैं। उनका प्राकट्य कलियुग के अंत में धर्म की पुनर्स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए होने का वर्णन मिलता है।

कल्कि जयंती हमें भगवान विष्णु के इस दिव्य स्वरूप का स्मरण करने और अपने जीवन में धर्म, सत्य, सदाचार तथा भक्ति को अपनाने की प्रेरणा देती है।

जय श्री हरि। जय श्री कल्कि भगवान।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

शास्त्रीय आधार

भगवान कल्कि के प्राकट्य का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के द्वादश स्कंध के द्वितीय अध्याय में मिलता है। कल्कि पुराण की परंपरा में भगवान कल्कि के जन्म, माता-पिता, शिक्षा, विवाह और अन्य लीलाओं से संबंधित विस्तृत कथाएं मिलती हैं।

महत्वपूर्ण सूचना: इस लेख में जिन बातों को “पुराणिक परंपरा” या “मान्यता” के रूप में लिखा गया है, उन्हें उसी रूप में समझना चाहिए। विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में कुछ विवरणों में अंतर मिल सकता है।

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डिस्क्लेमर

इस लेख में दी गई धार्मिक जानकारी विभिन्न हिन्दू धर्मग्रंथों, पुराणिक परंपराओं और प्रचलित मान्यताओं के आधार पर प्रस्तुत की गई है। अलग-अलग संप्रदायों, पंचांगों और धार्मिक परंपराओं में कुछ मतभेद हो सकते हैं।

इस लेख का उद्देश्य धार्मिक एवं सामान्य जानकारी प्रदान करना है। स्वास्थ्य संबंधी किसी समस्या में योग्य चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

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