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समस्त पापनाशक स्तोत्र | पाठ, अर्थ, माहात्म्य और लाभ

समस्त पापनाशक स्तोत्र | पाठ, अर्थ, माहात्म्य और लाभ

सनातन धर्म में पापों के प्रायश्चित के लिए अनेक स्तोत्र और मंत्र बताए गए हैं।
ऐसा ही एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है समस्त पापनाशक स्तोत्र
इसका उल्लेख अग्नि पुराण में मिलता है।

अग्नि पुराण में अग्निदेव द्वारा महर्षि वशिष्ठ को कई महत्वपूर्ण उपदेश दिए गए हैं।
उन्हीं में यह दिव्य स्तोत्र भी वर्णित है।

महात्मा पुष्कर के अनुसार मनुष्य कभी-कभी अज्ञानवश चोरी, हिंसा, परस्त्रीगमन जैसे पाप कर बैठता है।
जब उसका चित्त शुद्ध होने लगता है तो वह इन पापों से मुक्ति चाहता है।

ऐसे समय भगवान नारायण की स्तुति करने से मनुष्य को प्रायश्चित मिलता है।
इसी कारण इसे समस्त पापनाशक स्तोत्र कहा गया है।

समस्त पापनाशक स्तोत्र

पुष्करोवाच –

पुष्करोवाच विष्णवे विष्णवे नित्यं विष्णवे नमः।

नमामि विष्णुं चित्तस्थमहंकारगतिं हरिम्।। चित्तस्थमीशमव्यक्तमनन्तमपराजितम्।

विष्णुमीड्यमशेषेण अनादिनिधनं विभुम्।।

विष्णुश्चित्तगतो यन्मे विष्णुर्बुद्धिगतश्च यत्।

यच्चाहंकारगो विष्णुर्यद्वष्णुर्मयि संस्थितः।।

करोति कर्मभूतोऽसौ स्थावरस्य चरस्य च।

तत् पापं नाशमायातु तस्मिन्नेव हि चिन्तिते।।

ध्यातो हरति यत् पापं स्वप्ने दृष्टस्तु भावनात्।

तमुपेन्द्रमहं विष्णुं प्रणतार्तिहरं हरिम्।।

जगत्यस्मिन्निराधारे मज्जमाने तमस्यधः।

हस्तावलम्बनं विष्णु प्रणमामि परात्परम्।।

सर्वेश्वरेश्वर विभो परमात्मन्नधोक्षज।

हृषीकेश हृषीकेश हृषीकेश नमोऽस्तु ते।।

नृसिंहानन्त गोविन्द भूतभावन केशव।

दुरूक्तं दुष्कृतं ध्यातं शमयाघं नमोऽस्तु ते।।

यन्मया चिन्तितं दुष्टं स्वचित्तवशवर्तिना।

अकार्यं महदत्युग्रं तच्छमं नय केशव।।

बह्मण्यदेव गोविन्द परमार्थपरायण।

जगन्नाथ जगद्धातः पापं प्रशमयाच्युत।।

यथापराह्ने सायाह्ने मध्याह्ने च तथा निशि।

कायेन मनसा वाचा कृतं पापमजानता।।

जानता च हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव।

नामत्रयोच्चारणतः पापं यातु मम क्षयम्।।

शरीरं में हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव।

पापं प्रशमयाद्य त्वं वाक्कृतं मम माधव।।

यद् भुंजन् यत् स्वपंस्तिष्ठन् गच्छन् जाग्रद यदास्थितः।

कृतवान् पापमद्याहं कायेन मनसा गिरा।।

यत् स्वल्पमपि यत् स्थूलं कुयोनिनरकावहम्।

तद् यातु प्रशमं सर्वं वासुदेवानुकीर्तनात्।।

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं च यत्।

तस्मिन् प्रकीर्तिते विष्णौ यत् पापं तत् प्रणश्यतु।।

यत् प्राप्य न निवर्तन्ते गन्धस्पर्शादिवर्जितम्।

सूरयस्तत् पदं विष्णोस्तत् सर्वं शमयत्वघम्।। (अग्नि पुराणः 172.2-98)

माहात्म्यम् – पापप्रणाशनं स्तोत्रं यः पठेच्छृणुयादपि। शारीरैर्मानसैर्वाग्जैः कृतैः पापैः प्रमुच्यते।।

सर्वपापग्रहादिभ्यो याति विष्णोः परं पदम्।

तस्मात् पापे कृते जप्यं स्तोत्रं सर्वाघमर्दनम्।।

प्रायश्चित्तमघौघानां स्तोत्रं व्रतकृते वरम्।

प्रायश्चित्तैः स्तोत्रजपैर्व्रतैर्नश्यति पातकम्।।

(अग्नि पुराणः 172.17-29)

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पापनाशक स्तोत्र का माहात्म्य

अग्नि पुराण के अनुसार जो मनुष्य इस पापनाशक स्तोत्र का पाठ या श्रवण करता है,
वह शरीर, मन और वाणी से किए गए पापों से मुक्त हो जाता है।

यह स्तोत्र सभी पापों के प्रायश्चित के समान माना गया है।

जो व्यक्ति श्रद्धा से इसका जप करता है, वह पापग्रहों से भी मुक्त होकर
भगवान विष्णु के परम पद को प्राप्त करता है।

समस्त पापनाशक स्तोत्र के लाभ

स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए

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FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

Q1. समस्त पापनाशक स्तोत्र किस पुराण में मिलता है ?

यह स्तोत्र अग्नि पुराण में वर्णित है।

Q2. इस स्तोत्र का पाठ करने से क्या लाभ होता है ?

इसका पाठ करने से मनुष्य शरीर, मन और वाणी से किए गए पापों से मुक्ति प्राप्त करता है।

Q3. समस्त पापनाशक स्तोत्र किस भगवान की स्तुति है ?

यह स्तोत्र भगवान विष्णु और नारायण की स्तुति में किया जाता है।

Q4. क्या इस स्तोत्र का रोज पाठ किया जा सकता है ?

हाँ, श्रद्धा और भक्ति से इसका रोज पाठ किया जा सकता है।

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⚠️ डिसक्लेमर

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