कीलक स्तोत्र हिन्दी अर्थ सहित
दुर्गा सप्तशती का महत्वपूर्ण स्तोत्र
कीलक स्तोत्र का पाठ दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अंतर्गत किया जाता है।
इस स्तोत्र का पाठ अनिवार्य रूप से दुर्गा कवच और अर्गला स्तोत्र के बाद किया जाता है।
इस स्तोत्र के पहले मंत्र का 31 बार प्रतिदिन जप करने से मन में शांति प्राप्त होती है।
यहाँ कीलक स्तोत्र का पूरा विवरण अर्थ सहित दिया गया है।
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🔱 कीलक स्तोत्र
विनियोगः – ॐ अस्य कीलकमंत्रस्य शिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहासरस्वती देवता, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।।
ॐ नमश्चण्डिकायै
मार्कण्डेय उवाच-
ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे ।
श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे ।।1।।
सर्वमेतद्विजानियान्मंत्राणामभिकीलकम् ।
सोऽपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्परः ।।2।।
अर्थ
विशुद्ध ज्ञान जिनका स्वरूप है, तीनों वेद जिनके नेत्र हैं, ऐसे भगवान शिव को नमस्कार है।
यह स्तोत्र मंत्रों के सभी विघ्नों को दूर करता है और साधक को कल्याण प्रदान करता है।
सिध्यन्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलान्यपि ।
एतेन स्तुवतां देवी स्तोत्रमात्रेण सिद्ध्यति ।।3।।
न मन्त्रो नौषधं तत्र न किञ्चिदपि विद्यते ।
विना जाप्येन सिद्ध्यते सर्वमुच्चाटनादिकम् ।।4।।
अर्थ:
इस स्तोत्र के द्वारा सभी कार्य सिद्ध होते हैं।
मंत्र या औषधि की आवश्यकता नहीं रहती, केवल पाठ से ही सिद्धि प्राप्त होती है।
समग्राण्यपि सिद्धयन्ति लोकशङ्कामिमां हरः ।
कृत्वा निमन्त्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम् ।।5।।
स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार सः ।
समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावान्नियन्त्रणाम् ।।6।।
अर्थ:
भगवान शिव ने इस स्तोत्र को श्रेष्ठ बताया और इसे गुप्त रखा।
इसका पुण्य कभी समाप्त नहीं होता।
सोऽपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेवं न संशयः ।
कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः ।।7।।
ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति ।
इत्थंरूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ।।8।।
अर्थ:
जो साधक अष्टमी या चतुर्दशी को श्रद्धा से पाठ करता है,
उसी पर देवी प्रसन्न होती हैं।
यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम् ।
स सिद्धः स गणः सोऽपि गन्धर्वो जायते नरः ।।9।।
न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते ।
नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ।।10।।
अर्थ:
जो व्यक्ति इस स्तोत्र का नियमित पाठ करता है,
उसे भय नहीं होता, अपमृत्यु नहीं होती और अंत में मोक्ष प्राप्त होता है।
ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत न कुर्वाणो विनश्यति ।
ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधैः ।।11।।
सौभाग्यादि च यत्किञ्चित्त दृश्यते ललनाजने ।
तत्सर्वं तत्प्रसादेन तेन जाप्यमिदं शुभम् ।।12।।
अर्थ:
कीलक को समझकर ही पाठ करना चाहिए।
देवी की कृपा से ही सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है।
शनैस्तु जप्यमानेऽस्मिन् स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकैः ।
भवत्येव समग्रापि ततः प्रारभ्यमेव तत् ।।13।।
ऐश्वर्यं यत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पदः ।
शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः ।।14।।
अर्थ:
उच्च स्वर में पाठ करने से पूर्ण फल प्राप्त होता है।
देवी की कृपा से धन, स्वास्थ्य, विजय और मोक्ष प्राप्त होता है।
।। इति श्री दुर्गा सप्तशती कीलक स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।
कीलक स्तोत्र के लाभ
- मंत्र सिद्धि में बाधाएं दूर होती हैं
- कार्य शीघ्र सफल होते हैं
- शत्रु और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है
- सौभाग्य, आरोग्य और धन की प्राप्ति होती है
- मानसिक शांति और आत्मबल बढ़ता है
- आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष प्राप्त होता है
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❓ FAQ
Q1. कीलक स्तोत्र कब पढ़ना चाहिए ?
दुर्गा सप्तशती पाठ से पहले, कवच और अर्गला के बाद पढ़ना चाहिए।
Q2. क्या रोज कीलक स्तोत्र पढ़ सकते हैं ?
हाँ, रोज पढ़ना बहुत शुभ माना जाता है।
Q3. इसका मुख्य लाभ क्या है ?
यह सभी बाधाओं को दूर कर कार्य सिद्ध करता है।
Q4. कितनी बार जप करना चाहिए ?
पहले मंत्र का 31 बार जप विशेष लाभ देता है।
🙏 जय माता दी 🙏
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