द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 – पूजा विधि, मुहूर्त, व्रत कथा

फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। यह दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश को समर्पित है। इस व्रत से जीवन के संकट दूर होते हैं। सुख और समृद्धि बढ़ती है।


📅 द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 तिथि

  • माह: फाल्गुन
  • पक्ष: कृष्ण पक्ष
  • तिथि: चतुर्थी
  • व्रत पारण: चंद्र दर्शन के बाद

नियम: संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही पूरा माना जाता है।


📅 द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 — तिथि और समय

विवरण समय / तिथि
व्रत की तारीख 5 फरवरी 2026 (गुरुवार)
चतुर्थी तिथि प्रारंभ 5 फरवरी 2026, रात्रि 12:09 बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त 6 फरवरी 2026, रात्रि 12:22 बजे
चंद्र उदय (चंद्र दर्शन) लगभग रात 9:35 बजे
व्रत पारण चंद्र दर्शन के बाद

🪔 पूजा का शुभ मुहूर्त

पूजा चरण समय
पूजा आरंभ चतुर्थी तिथि प्रारंभ होते ही (5 फरवरी 2026 रात 12:10 बजे के बाद)
चंद्र दर्शन एवं पारण चंद्र उदय के बाद (~9:35 बजे रात)

महत्वपूर्ण नियम: चंद्र दर्शन से पहले व्रत पारण नहीं किया जाता।

🙏 द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का महत्व

इस दिन भगवान गणेश के द्विजप्रिय स्वरूप की पूजा की जाती है।

  • द्विज का अर्थ है — दो बार जन्मे
  • यह रूप ज्ञान और संपत्ति का प्रतीक है
  • चार हाथ चार वेदों का संकेत देते हैं
  • इस पूजा से ग्रह दोष कम होते हैं
  • मानसिक तनाव दूर होता है

🛕 पूजा सामग्री

  • गणेश जी की प्रतिमा
  • दूर्वा (11 गांठ)
  • लाल पुष्प
  • मोदक या लडडू
  • धूप, दीप
  • रोली, अक्षत
  • जल का कलश

🪔 द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि

  1. सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  2. गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें।
  3. दीपक और धूप जलाएं।
  4. रोली, अक्षत अर्पित करें।
  5. 11 दूर्वा गांठ चढ़ाएं।
  6. लाल फूल अर्पित करें।
  7. मोदक का भोग लगाएं।
  8. इस मंत्र का 108 बार जाप करें —
    ॐ श्रीं गम सौभाग्य गणपतये वरवरद सर्वजन्मन्य वषमान्य नमः॥
  9. आरती करें।
  10. रात्रि में चंद्रमा को जल अर्पित करें।
  11. इसके बाद व्रत पारण करें।

📖 द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

प्राचीन समय में देवताओं के कार्यों में बाधाएँ आने लगीं। वे ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने गणेश जी की आराधना करने को कहा।

देवताओं ने गणेश जी से प्रार्थना की। गणेश जी बोले — जो भक्त कृष्ण पक्ष चतुर्थी को व्रत करेगा और चंद्रमा को अर्घ्य देगा, उसके संकट दूर होंगे।

एक निर्धन ब्राह्मण ने भी यह व्रत किया। उसने पूरे नियम से पूजा की। कुछ ही समय में उसका जीवन बदल गया। धन, स्वास्थ्य और सम्मान प्राप्त हुआ। तभी से यह व्रत संकष्टी चतुर्थी कहलाया।


📜 द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत के नियम

  • दिनभर संयम रखें
  • सात्विक भोजन करें
  • क्रोध और झूठ से दूर रहें
  • चंद्र दर्शन से पहले व्रत न खोलें

✨ व्रत के लाभ

  • सभी बाधाएँ दूर होती हैं
  • धन और व्यापार में वृद्धि
  • परिवार में सुख शांति
  • स्वास्थ्य में सुधार
  • मनोकामना पूर्ति

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❓ FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

प्रश्न 1: संकष्टी चतुर्थी का व्रत कब खोला जाता है ?

चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद।

प्रश्न 2: इस दिन क्या चढ़ाना चाहिए ?

दूर्वा, लाल फूल और मोदक।

प्रश्न 3: कौन सा मंत्र जपें ?

ॐ श्रीं गम सौभाग्य गणपतये वरवरद सर्वजन्मन्य वषमान्य नमः॥

प्रश्न 4: इस व्रत से क्या लाभ मिलता है ?

संकट दूर होते हैं। सुख-समृद्धि बढ़ती है।


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