कर्णवेध संस्कार क्यों करवाना चाहिए  (Why should ear piercing ceremony be done in Hindi)

जिस संस्कार में विधिपूर्वक सर्वप्रथम बालक का दाहिना एवं बालिका के बाएं कान का छेदन किया जाता है।उसे कर्णवेध संस्कार कहते हैं। चूड़ाकरण के पश्चात् कर्णवेध संस्कार किया जाता है, यह संस्कार जातक का तीसरे अथवा पांचवें वर्ष में संपन्न होता है। दीर्घायु एवं श्री (लक्ष्मी)की वृद्धि के लिए यह संस्कार शास्त्रों में उल्लिखित है। इस संस्कार से बालक के मूत्रद्वार एवं अंडकोष से संबंधित रोग नहीं होते हैं। इन्द्रिय संयम के लिए भी कर्णवेध संस्कार का महान उपयोग है।

बालक का दोनों कान एवं कन्या की नाक और कान छेदने का विधान है। कानों में स्वर्ण का स्पर्श निरन्तर रहे यह शास्त्रीय नियम है। बालक के कर्ण छिद्र में सूर्य किरण प्रवेश हो जाए तथा कन्या के कान में आभूषण पहनने योग्य छिद्र करना चाहिए। कर्णवेध अनिष्ट कारक बालग्रहों से बालक एवं बालिका की रक्षा करता है। कर्णवेध संस्कार पूर्णतः शास्त्रीय संस्कार है। भारत में विभिन्न प्रांतों की जनजातियां कर्णवेध के महत्व को समझते हुए और अपनी परम्पराओं की रक्षा हेतु कर्ण छेदन कराती है। नाथ संप्रदाय में भी कर्ण छेदन का अत्यंत महत्त्व है।

इस संस्कार को 6 माह से लेकर 16 माह तक अथवा 3, 5 आदि विषम वर्षों में या कुल की परंपरा के अनुसार उचित आयु में किया जाता है। इसे स्त्री-पुरुषों में पूर्ण स्त्रीत्व एवं पुरुषत्व की प्राप्ति के उद्देश्य से कराया जाता है। मान्यता यह भी है कि सूर्य की किरणें कानों के छिद्र से प्रवेश पाकर बालक-बालिका को तेज संपन्न बनाती हैं। बालिकाओं के आभूषण धारण हेतु तथा रोगों से बचाव हेतु यह संस्कार आधुनिक एक्युपंचर पद्धति के अनुरूप एक सशक्त माध्यम भी है।

हमारे शास्त्रों में कर्णवेध रहित पुरुष को श्राद्ध का अधिकारी नहीं माना गया है।

देवल स्मृति ने स्पष्ट कहा है कि जिस व्यक्ति के कर्णरन्ध्र में सूर्य की किरणें प्रविष्ट नहीं हो पाती, उसको देखते ही सारे पुण्य नष्ट हो जाते हैं। यदि कर्णवेध संस्कार न किए गए ब्राह्मण को श्राद्ध में निमन्त्रित कर लिया जाए, तो निमन्त्रित करने वाला व्यक्ति असुर हो जाता है

तस्मै श्राद्धं न दातव्यं, यदि चेदसुरं भवेत्।

ब्राह्मण और वैश्य का कर्णवेध चांदी की सुई से, शुद्र का लोहे की सुई से तथा क्षत्रिय और संपन्न पुरुषों का सोने की सुई से करने का विधान है।

शुभ समय में, पवित्र स्थान पर बैठकर देवताओं का पूजन करने के पश्चात् सूर्य के सम्मुख बालक या बालिका के कानों को निम्न मंत्र द्वारा अभिमंत्रित करना चाहिए

भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।

स्थिरैरंगैस्तुष्टुवां सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः ॥ यजुर्वेद 25/21

इसके बाद बालक के दाहिने कान में पहले और बाएं कान में बाद में सुई से छेद करें उनमें कुंडल आदि पहनाएं। बालिका के पहले बाएं कान में, फिर दाहिने कान में छेद करके तथा बाएं नाक में भी छेद करके आभूषण पहनाने का विधान है।

मस्तिष्क के दोनों भागों को विद्युत के प्रभावों से प्रभावशील बनाने के लिए नाक और कान में छिद्र करके सोना पहनना लाभकारी माना गया है। नाक में नथुनी पहनने से नासिका संबंधी रोग नहीं होते और सर्दी-खांसी में राहत मिलती है। जबकि कानों में सोने की बालियां या झुमके आदि पहनने से स्त्रियों में मासिक धर्म नियमित रहता है, इससे हिस्टीरिया रोग में लाभ मिलता है।

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