कार्तिक माह महात्म्य सत्ताईसवां अध्याय Kartik month Mahatmya twenty-seventh chapter 

कृष्ण नाम का आसरा, कृष्ण नाम का ध्यान।

सत्ताईसवाँ अध्याय अब, लिखने लगा महान।। 

पार्षदों ने कहा– एक दिन की बात है, विष्णुदास ने नित्यकर्म करने के पश्चात भोजन तैयार किया किन्तु कोई छिपकर उसे चुरा ले गया. विष्णुदास ने देखा भोजन नहीं है परन्तु उन्होंने दुबारा भोजन नहीं बनाया क्योंकि ऎसा करने पर सायंकाल की पूजा के लिए उन्हें अवकाश नहीं मिलता. अत: प्रतिदिन के नियम का भंग हो जाने का भय था. दूसरे दिन पुन: उसी समय पर भोजन बनाकर वे ज्यों ही भगवान विष्णु को भोग अर्पण करने के लिए गये त्यों ही किसी ने आकर फिर सारा भोजन हड़प लिया।

इस प्रकार सात दिनों तक लगातार कोई उनका भोजन चुराकर ले जाता रहा. इससे विष्णुदास को बड़ा विस्मय हुआ वे मन ही मन इस प्रकार विचार करने लगे– अहो कौन प्रतिदिन आकर मेरी रसोई चुरा ले जाता है. यदि दुबारा रसोई बनाकर भोजन करता हूँ तो सायंकाल की पूजा छूट जाती है. यदि रसोई बनाकर तुरन्त ही भोजन कर लेना उचित हो तो मुझसे यह न होगा क्योंकि भगवान विष्णु को सब कुछ अर्पण किये बिना कोई भी वैष्णव भोजन नहीं करता. आज उपवास करते मुझे सात दिन हो गये. इस प्रकार मैं व्रत में कब तक स्थिर रह सकता हूँ. अच्छा आज मैं रसोई की भली-भाँति रक्षा करुँगा।

ऎसा निश्चय कर के भोजन बनाने के पश्चात वे वहीं कहीं छिपकर खड़े हो गये. इतने में ही उन्हें एक चाण्डाल दिखाई दिया जो रसोई का अन्न हरकर जाने के लिए तैयार खड़ा था. भूख के मारे उसका सारा शरीर दुर्बल हो गया था मुख पर दीनता छा रही थी. शरीर में हाड़ और चाम के सिवा कुछ शेष नहीं बचा था. उसे देखकर श्रेष्ठ ब्राह्मण विष्णुदास का हृदय करुणा से भर आया. उन्होंने भोजन चुराने वाले चाण्डाल की ओर देखकर कहा– भैया जरा ठहरो, ठहरो क्यों रूखा-सूखा खाते हो? यह घी तो ले लो।

इस प्रकार कहते हुए विप्रवर विष्णुदास को आते देख वज चाण्डाल भय के मारे बड़े वेग से भागा और कुछ ही दूरी पर मूर्छित होकर गिर पड़ा. चाण्डाल को भयभीत और मूर्छित देखकर द्विजश्रेष्ठ विष्णुदास बड़े वेग से उसके समीप आये और दयावश अपने वस्त्र के छोर से उसको हवा करने लगे. तदन्तर जब वह उठकर खड़ा हुआ तब विष्णुदास ने देखा वहाँ चाण्डाल नहीं हैं बल्कि साक्षात नारायण ही शंख, चक्र और गदा धारण किये सामने उपस्थित हैं. अपने प्रभु को प्रत्यक्ष देखकर विष्णुदास सात्विक भावों के वशीभूत हो गये. वे स्तुति और नमस्कार करने में भी समर्थ न हो सके तब भगवान ने सात्विक व्रत का पालन करने वाले अपने भक्त विष्णुदास को छाती से लगा लिया और उन्हें अपने जैसा रूप देकर वैकुण्ठधाम को ले चले।

उस समय यज्ञ में दीक्षित हुए राजा चोल ने देखा– विष्णुदास एक श्रेष्ठ विमान पर बैठकर भगवान विष्णु के समीप जा रहे हैं. विष्णुदास को वैकुण्ठधाम में जाते देख राजा ने शीघ्र ही अपने गुरु महर्षि मुद्गल को बुलाया और इस प्रकार कहना आरम्भ किया– जिसके साथ स्पर्धा करके मैंने इस यज्ञ, दान आदि कर्म का अनुष्ठान किया है वह ब्राह्मण आज भगवान विष्णु का रुप धारण करके मुझसे पहले ही वैकुण्ठधाम को जा रहा है.

मैंने इस वैष्णवधाम में भली-भाँति दीक्षित होकर अग्नि में हवन किया और दान आदि के द्वारा ब्राह्मणों का मनोरथ पूर्ण किया तथापि अभी तक भगवान विष्णु मुझ पर प्रसन्न नहीं हुए और इस विष्णुदास को केवल भक्ति के ही कारण श्रीहरि ने प्रत्यक्ष दर्शन दिया है. अत: जान पड़ता है कि भगवान विष्णु केवल दान और यज्ञों से प्रसन्न नहीं होते. उन प्रभु का दर्शन कराने में भक्ति ही प्रधान कारण है।

दोनों पार्षदों ने कहा– इस प्रकार कहकर राजा ने अपने भानजे को राज सिंहासन पर अभिषिक्त कर दिया. वे बचपन से ही यज्ञ की दीक्षा लेकर उसी में संलग्न रहते थे इसलिए उन्हें कोई पुत्र नहीं हुआ था. यही कारण है कि उस देश में अब तक भानजे ही राज्य के उत्तराधिकारी होते हैं. भानजे को राज्य देकर राजा यज्ञशाला में गये और यज्ञकुण्ड के सामने खड़े होकर भगवान विष्णु को सम्बोधित करते हुए तीन बार उच्च स्वर से निम्नांकित वचन बोले – भगवान विष्णु! आप मुझे मन, वाणी, शरीर और क्रिया द्वारा होने वाली अविचल भक्ति प्रदान कीजिए।

 

इस प्रकार कहकर वे सबके देखते-देखते अग्निकुण्ड में कूद पड़े. बस, उसी क्षण भक्तवत्सल भगवान विष्णु अग्निकुण्ड में प्रकट हो गये. उन्होंने राजा को छाती से लगाकर एक श्रेष्ठ विमान में बैठाया और उन्हें अपने साथ लेकर वैकुण्ठधाम को प्रस्थान किया।

नारद जी बोले– हे राजन जो विष्णुदास थे वे तो पुण्यशील नाम से प्रसिद्ध भगवान के पार्षद हुए और जो राजा चोल थे उनका नाम सुशील हुआ. इन दोनों को अपने ही समान रूप देकर भगवान लक्ष्मीपति ने अपना द्वारपाल बना लिया।

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