उसी दिन राजकुमारी का विवाह होना था। परिस्थितिवश चिरायु को वर बनाकर विवाह संपन्न कराया गया। विवाह की रात्रि में जब काल सर्प के रूप में चिरायु का प्राण लेने आया, तब राजकुमारी ने माता मंगला गौरी का स्मरण किया, सर्प का पूजन किया और श्रद्धापूर्वक प्रार्थना की। माता की कृपा से सर्प शांत हो गया और चिरायु के प्राण बच गए

मंगला गौरी आरती

जय मंगला गौरी माता, जय मंगला गौरी माता।
ब्रह्मा सनातन देवी शुभ फल सदा दाता॥
जय मंगला गौरी माता, जय मंगला गौरी माता॥

अरिकुल पद्मा विनासनी, जय सेवक त्राता।
जग जीवन जगदम्बा, हरिहर गुण गाता॥
जय मंगला गौरी माता, जय मंगला गौरी माता॥

सिंह को वाहन साजे, कुंडल है साथा।
देव वधु जहं गावत, नृत्य करता था॥
जय मंगला गौरी माता, जय मंगला गौरी माता॥

सतयुग शील सुसुन्दर, नाम सती कहलाता।
हेमांचल घर जन्मी, सखियन रंगराता॥
जय मंगला गौरी माता, जय मंगला गौरी माता॥

शुम्भ निशुम्भ विदारे, हेमांचल स्याता।
सहस भुजा तनु धरिके, चक्र लियो हाता॥
जय मंगला गौरी माता, जय मंगला गौरी माता॥

सृष्टि रूप तुही जननी, शिव संग रंगराता।
नंदी भृंगी बीन लाही, सारा मद माता॥
जय मंगला गौरी माता, जय मंगला गौरी माता॥

देवन अरज करत, हम चित को लाता।
गावत दे दे ताली, मन में रंगराता॥
जय मंगला गौरी माता, जय मंगला गौरी माता॥

मंगला गौरी माता की आरती जो कोई गाता।
सदा सुख-संपत्ति पाता॥
जय मंगला गौरी माता, जय मंगला गौरी माता॥

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मंगला गौरी व्रत का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मंगला गौरी व्रत करने से अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु, संतान सुख, परिवार में सुख-शांति तथा समृद्धि की प्राप्ति होती है। विवाह के बाद लगातार पाँच वर्षों तक श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करने और विधिपूर्वक उद्यापन करने से माता मंगला गौरी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

निष्कर्ष

मंगला गौरी व्रत श्रावण मास का अत्यंत पुण्यदायी और सौभाग्य प्रदान करने वाला व्रत माना गया है। इस लेख में आपने मंगला गौरी व्रत 2026 की तिथि, पूजन सामग्री, संपूर्ण पूजा-विधि, स्कन्द पुराण में वर्णित व्रत कथा, आरती तथा धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से जाना। श्रद्धा और विधि-विधान से किया गया यह व्रत माता मंगला गौरी की कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ माध्यम माना जाता है।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. मंगला गौरी व्रत 2026 कब है ? वर्ष 2026 में मंगला गौरी व्रत श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को रखा जाएगा। इस वर्ष व्रत 4 अगस्त, 11 अगस्त, 18 अगस्त और 25 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा। Q2. मंगला गौरी व्रत कौन रख सकता है ? यह व्रत मुख्य रूप से विवाहित एवं नवविवाहित महिलाएं रखती हैं। हालांकि माता मंगला गौरी की कृपा प्राप्त करने की इच्छा रखने वाली कोई भी महिला श्रद्धापूर्वक यह व्रत कर सकती है।

Q3. मंगला गौरी व्रत क्यों रखा जाता है ?

यह व्रत अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु, सुखी दांपत्य जीवन, संतान सुख तथा परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से रखा जाता है।

Q4. मंगला गौरी व्रत कितने वर्षों तक करना चाहिए ?

धार्मिक मान्यता के अनुसार विवाह के बाद लगातार पाँच वर्षों तक यह व्रत करने के पश्चात विधि-विधान से इसका उद्यापन किया जाता है।

Q5. मंगला गौरी व्रत में कौन-कौन सी पूजन सामग्री आवश्यक होती है ?

पूजन में फल, फूल, लड्डू, पान, सुपारी, इलायची, लौंग, सोलह श्रृंगार की सामग्री, 16 चूड़ियां, सूखे मेवे, सात प्रकार के धान्य, कलश, दीपक तथा अन्य पूजन सामग्री का उपयोग किया जाता है।

Q6. मंगला गौरी व्रत की कथा का क्या महत्व है ?

स्कन्द पुराण में वर्णित मंगला गौरी व्रत कथा का श्रवण करने से माता की कृपा प्राप्त होती है तथा व्रत का पूर्ण फल मिलने की मान्यता है।

Q7. मंगला गौरी व्रत का उद्यापन कैसे किया जाता है ?

लगातार पाँच वर्षों तक व्रत करने के बाद माता मंगला गौरी का विशेष पूजन, प्रतिमा स्थापना, वायन अर्पण, सोलह सुहागिन महिलाओं को भोजन एवं दक्षिणा देकर विधिपूर्वक उद्यापन किया जाता है।

Q8. क्या मंगला गौरी व्रत में आरती और व्रत कथा पढ़ना आवश्यक है ?

हाँ, पूजा के अंत में मंगला गौरी व्रत कथा का श्रवण तथा माता मंगला गौरी की आरती करना शुभ माना जाता है। इससे व्रत की पूजा पूर्ण मानी जाती है। ॥ जय माँ मंगला गौरी ॥

⚠️ डिसक्लेमर

इस लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, पंचांग, मान्यताओं या धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य केवल सूचना पहुंचाना है। इसके सही और सिद्ध होने की प्रामाणिकता नहीं दी जा सकती। कृपया किसी भी प्रकार के उपयोग से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।

मंगला गौरी व्रत 2026: शुभ तिथियां, पूजा विधि, पूजन सामग्री, व्रत कथा, आरती और उद्यापन

मंगला गौरी व्रत श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ रखा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से विवाहित एवं नवविवाहित महिलाओं के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि माता मंगला गौरी की उपासना से अखंड सौभाग्य, सुखी दांपत्य जीवन, पति की दीर्घायु तथा संतान की उन्नति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कई महिलाएं विवाह के बाद लगातार पाँच वर्षों तक इस व्रत का पालन करती हैं और इसके पश्चात विधि-विधान से उद्यापन करती हैं।

वर्ष 2026 में भी श्रावण मास के सभी मंगलवार मंगला गौरी व्रत के लिए अत्यंत शुभ रहेंगे। इस लेख में आपको मंगला गौरी व्रत 2026 की संपूर्ण जानकारी मिलेगी, जिसमें व्रत का धार्मिक महत्व, पूजन सामग्री, संपूर्ण पूजा-विधि, उद्यापन की प्रक्रिया, स्कन्द पुराण में वर्णित मंगलागौरी व्रत कथा तथा माता मंगला गौरी की आरती शामिल है। यदि आप पहली बार यह व्रत कर रहे हैं या इसकी संपूर्ण विधि जानना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा।

मंगला गौरी व्रत 2026 कब है ?

वर्ष 2026 में श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को मंगला गौरी व्रत रखा जाएगा। इस दिन माता पार्वती के मंगला गौरी स्वरूप की विधि-विधान से पूजा की जाती है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक यह व्रत करने से अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु, संतान सुख तथा परिवार में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

मंगला गौरी व्रत 2026 की तिथियां

  • प्रथम मंगला गौरी व्रत – 4 अगस्त 2026, मंगलवार
  • द्वितीय मंगला गौरी व्रत – 11 अगस्त 2026, मंगलवार
  • तृतीय मंगला गौरी व्रत – 18 अगस्त 2026, मंगलवार
  • चतुर्थ मंगला गौरी व्रत – 25 अगस्त 2026, मंगलवार

मंगला गौरी व्रत विशेष

उपवास विधि

मंगला गौरी व्रत श्रावण मास में पड़ने वाले सभी मंगलवार को रखा जाता है। श्रावण मास में आने वाले सभी व्रत और उपवास व्यक्ति के सुख, सौभाग्य तथा पारिवारिक समृद्धि में वृद्धि करने वाले माने गए हैं। सौभाग्य से जुड़े होने के कारण यह व्रत विशेष रूप से विवाहित एवं नवविवाहित महिलाएं करती हैं। इस व्रत का मुख्य उद्देश्य अपने पति की दीर्घायु, सुखी वैवाहिक जीवन तथा संतान की उन्नति की कामना करना है।

पूजन सामग्री

मंगला गौरी व्रत-पूजन के लिए निम्न सामग्री की आवश्यकता होती है

  • फल
  • फूल एवं फूलों की मालाएं
  • लड्डू
  • पान
  • सुपारी
  • इलायची
  • लौंग
  • जीरा
  • धनिया (इन सभी वस्तुओं की संख्या 16-16 होनी चाहिए)
  • साड़ी सहित सोलह श्रृंगार की 16 वस्तुएं
  • 16 चूड़ियां
  • पांच प्रकार के सूखे मेवे (16-16 बार)
  • सात प्रकार के धान्य—गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल तथा मसूर (16-16 बार)

मंगला गौरी व्रत कैसे करें ?

इस व्रत को करने वाली महिलाओं को श्रावण मास के प्रथम मंगलवार के दिन संकल्प लेकर व्रत का आरंभ करना चाहिए। प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर माता मंगला गौरी की प्रतिमा या चित्र को लाल वस्त्र में लपेटकर लकड़ी की चौकी पर स्थापित करें। इसके बाद गेहूं के आटे का दीपक बनाकर उसमें 16-16 तार वाली चार सूती बत्तियां रखें और पूजा के समय उन्हें प्रज्वलित करें।

मंगला गौरी व्रत विधि

  • प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
  • एक चौकी पर पहले सफेद तथा उसके ऊपर लाल वस्त्र बिछाएं।
  • सफेद वस्त्र पर चावल से नवग्रह तथा लाल वस्त्र पर गेहूं से षोडश माताओं का निर्माण करें।
  • चौकी के एक ओर चावल और पुष्प रखकर भगवान श्रीगणेश की स्थापना करें।
  • दूसरी ओर गेहूं रखकर जल से भरा कलश स्थापित करें।
  • गेहूं के आटे का चौमुखी दीपक बनाकर उसमें 16-16 तार वाली चार सूती बत्तियां जलाएं।
  • सबसे पहले भगवान श्रीगणेश का विधिपूर्वक पूजन करें।
  • श्रीगणेश को जल, रोली, मौली, चंदन, सिंदूर, सुपारी, लौंग, पान, चावल, पुष्प, इलायची, बेलपत्र, फल, मेवा तथा दक्षिणा अर्पित करें।
  • इसके बाद कलश का पूजन भी श्रीगणेश पूजा के समान विधि से करें।
  • फिर नवग्रहों तथा षोडश माताओं का पूजन करें। पूजा में अर्पित सामग्री ब्राह्मण को दान दें।
  • माता मंगला गौरी की प्रतिमा को जल, दूध और दही से स्नान कराकर नवीन वस्त्र पहनाएं।
  • माता को रोली, चंदन, सिंदूर, मेहंदी और काजल अर्पित करें तथा सोलह श्रृंगार से उनका श्रृंगार करें।
  • सोलह प्रकार के पुष्प-पत्रों की माला अर्पित करें। इसके बाद मेवे, सुपारी, लौंग, मेहंदी, शीशा, कंघी और चूड़ियां चढ़ाएं।
  • अंत में श्रद्धापूर्वक मंगला गौरी व्रत कथा का श्रवण करें।
  • व्रत कथा के पश्चात विवाहित महिला अपनी सास और ननद को सोलह लड्डू भेंट करे तथा यही प्रसाद ब्राह्मण को भी अर्पित करे।
  • अंतिम व्रत के अगले दिन, बुधवार को माता मंगला गौरी की प्रतिमा का नदी, सरोवर या किसी पवित्र जलाशय में विसर्जन करें।
धार्मिक मान्यता: श्रद्धा, नियम और विधि-विधान से किए गए मंगला गौरी व्रत से अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु, संतान सुख तथा परिवार में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

मंगलागौरी व्रत का वर्णन तथा व्रत कथा

ईश्वर बोले – हे सनत्कुमार! अब मैं अत्युत्तम भौम व्रत का वर्णन करूँगा, जिसके अनुष्ठान करने मात्र से वैधव्य नहीं होता है। विवाह होने के पश्चात पाँच वर्षों तक यह व्रत करना चाहिए। इसका नाम मंगला गौरी व्रत है। यह समस्त पापों का नाश करने वाला तथा अखंड सौभाग्य प्रदान करने वाला व्रत माना गया है।

विवाह के पश्चात प्रथम श्रावण शुक्ल पक्ष के पहले मंगलवार को इस व्रत का आरंभ करना चाहिए। केले के खम्भों से सुशोभित पुष्पमंडप बनाकर उसे फलों और रेशमी वस्त्रों से सजाया जाता है। उस मंडप में अपनी सामर्थ्य के अनुसार देवी की स्वर्ण अथवा अन्य धातु की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।

इसके बाद देवी का षोडशोपचार पूजन किया जाता है। सोलह दूर्वा दल, सोलह अक्षत, सोलह चने की दाल तथा सोलह दीपक अर्पित किए जाते हैं। दही-भात का नैवेद्य अर्पित कर देवी के समीप पत्थर का सिल-लोढ़ा स्थापित किया जाता है। पाँच वर्षों तक यह व्रत करने के पश्चात विधिवत उद्यापन करना चाहिए।

उद्यापन की विधि

उद्यापन के समय अपनी सामर्थ्य के अनुसार स्वर्ण अथवा अन्य धातु से माता मंगला गौरी की प्रतिमा बनवाकर वस्त्र एवं आभूषणों सहित पूजन किया जाता है। चाँदी का सिल-लोढ़ा अर्पित कर माता को वायन दिया जाता है तथा सोलह सुहागिन महिलाओं को भोजन कराकर दक्षिणा दी जाती है। इस प्रकार व्रत पूर्ण करने से सात जन्मों तक अखंड सौभाग्य और संतान सुख की प्राप्ति होती है।

मंगला गौरी व्रत कथा

सनत्कुमार ने भगवान शिव से पूछा कि इस व्रत को सबसे पहले किसने किया और किसे इसका फल प्राप्त हुआ। तब भगवान शिव ने बताया कि प्राचीन काल में कुरु देश में श्रुतकीर्ति नामक एक प्रतापी राजा राज्य करता था। उसके पास धन, वैभव और यश की कोई कमी नहीं थी, परंतु संतान न होने के कारण वह अत्यंत दुःखी रहता था।

राजा ने कठोर तप कर देवी की आराधना की। देवी प्रसन्न होकर प्रकट हुईं और वरदान माँगने को कहा। राजा ने गुणवान पुत्र की कामना की। देवी ने कहा कि यदि गुणवान पुत्र होगा तो उसकी आयु केवल सोलह वर्ष होगी और यदि दीर्घायु पुत्र होगा तो वह गुणों से रहित होगा। राजा ने गुणवान पुत्र का ही वर माँगा। देवी ने मंदिर के आम का फल अपनी रानी को खिलाने का आदेश दिया। देवी की कृपा से रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम चिरायु रखा गया।

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समय बीतने पर जब चिरायु सोलह वर्ष का होने लगा तो राजा और रानी अत्यंत चिंतित हुए। उन्होंने अपने पुत्र को उसके मामा के साथ काशी यात्रा पर भेज दिया। यात्रा के दौरान वे आनंद नामक नगर पहुँचे, जहाँ राजा वीरसेन की पुत्री मंगला गौरी अपनी सखियों के साथ उपवन में विहार कर रही थी। वहीं उसने अपनी सखियों से कहा कि माता मंगला गौरी के व्रत के प्रभाव से जिस पुरुष के मस्तक पर उसके हाथों से अक्षत पड़ेंगे, वह अल्पायु होने पर भी दीर्घायु हो जाएगा।

उसी दिन राजकुमारी का विवाह होना था। परिस्थितिवश चिरायु को वर बनाकर विवाह संपन्न कराया गया। विवाह की रात्रि में जब काल सर्प के रूप में चिरायु का प्राण लेने आया, तब राजकुमारी ने माता मंगला गौरी का स्मरण किया, सर्प का पूजन किया और श्रद्धापूर्वक प्रार्थना की। माता की कृपा से सर्प शांत हो गया और चिरायु के प्राण बच गए

मंगला गौरी आरती

जय मंगला गौरी माता, जय मंगला गौरी माता।
ब्रह्मा सनातन देवी शुभ फल सदा दाता॥
जय मंगला गौरी माता, जय मंगला गौरी माता॥

अरिकुल पद्मा विनासनी, जय सेवक त्राता।
जग जीवन जगदम्बा, हरिहर गुण गाता॥
जय मंगला गौरी माता, जय मंगला गौरी माता॥

सिंह को वाहन साजे, कुंडल है साथा।
देव वधु जहं गावत, नृत्य करता था॥
जय मंगला गौरी माता, जय मंगला गौरी माता॥

सतयुग शील सुसुन्दर, नाम सती कहलाता।
हेमांचल घर जन्मी, सखियन रंगराता॥
जय मंगला गौरी माता, जय मंगला गौरी माता॥

शुम्भ निशुम्भ विदारे, हेमांचल स्याता।
सहस भुजा तनु धरिके, चक्र लियो हाता॥
जय मंगला गौरी माता, जय मंगला गौरी माता॥

सृष्टि रूप तुही जननी, शिव संग रंगराता।
नंदी भृंगी बीन लाही, सारा मद माता॥
जय मंगला गौरी माता, जय मंगला गौरी माता॥

देवन अरज करत, हम चित को लाता।
गावत दे दे ताली, मन में रंगराता॥
जय मंगला गौरी माता, जय मंगला गौरी माता॥

मंगला गौरी माता की आरती जो कोई गाता।
सदा सुख-संपत्ति पाता॥
जय मंगला गौरी माता, जय मंगला गौरी माता॥

Must Read कुंडली: जानें कुण्डली में स्थित अशुभ योग के प्रभाव एवं उपाय और ग्रहों की नाराजगी कैसे करें दूर

मंगला गौरी व्रत का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मंगला गौरी व्रत करने से अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु, संतान सुख, परिवार में सुख-शांति तथा समृद्धि की प्राप्ति होती है। विवाह के बाद लगातार पाँच वर्षों तक श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करने और विधिपूर्वक उद्यापन करने से माता मंगला गौरी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

निष्कर्ष

मंगला गौरी व्रत श्रावण मास का अत्यंत पुण्यदायी और सौभाग्य प्रदान करने वाला व्रत माना गया है। इस लेख में आपने मंगला गौरी व्रत 2026 की तिथि, पूजन सामग्री, संपूर्ण पूजा-विधि, स्कन्द पुराण में वर्णित व्रत कथा, आरती तथा धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से जाना। श्रद्धा और विधि-विधान से किया गया यह व्रत माता मंगला गौरी की कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ माध्यम माना जाता है।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. मंगला गौरी व्रत 2026 कब है ? वर्ष 2026 में मंगला गौरी व्रत श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को रखा जाएगा। इस वर्ष व्रत 4 अगस्त, 11 अगस्त, 18 अगस्त और 25 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा। Q2. मंगला गौरी व्रत कौन रख सकता है ? यह व्रत मुख्य रूप से विवाहित एवं नवविवाहित महिलाएं रखती हैं। हालांकि माता मंगला गौरी की कृपा प्राप्त करने की इच्छा रखने वाली कोई भी महिला श्रद्धापूर्वक यह व्रत कर सकती है।

Q3. मंगला गौरी व्रत क्यों रखा जाता है ?

यह व्रत अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु, सुखी दांपत्य जीवन, संतान सुख तथा परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से रखा जाता है।

Q4. मंगला गौरी व्रत कितने वर्षों तक करना चाहिए ?

धार्मिक मान्यता के अनुसार विवाह के बाद लगातार पाँच वर्षों तक यह व्रत करने के पश्चात विधि-विधान से इसका उद्यापन किया जाता है।

Q5. मंगला गौरी व्रत में कौन-कौन सी पूजन सामग्री आवश्यक होती है ?

पूजन में फल, फूल, लड्डू, पान, सुपारी, इलायची, लौंग, सोलह श्रृंगार की सामग्री, 16 चूड़ियां, सूखे मेवे, सात प्रकार के धान्य, कलश, दीपक तथा अन्य पूजन सामग्री का उपयोग किया जाता है।

Q6. मंगला गौरी व्रत की कथा का क्या महत्व है ?

स्कन्द पुराण में वर्णित मंगला गौरी व्रत कथा का श्रवण करने से माता की कृपा प्राप्त होती है तथा व्रत का पूर्ण फल मिलने की मान्यता है।

Q7. मंगला गौरी व्रत का उद्यापन कैसे किया जाता है ?

लगातार पाँच वर्षों तक व्रत करने के बाद माता मंगला गौरी का विशेष पूजन, प्रतिमा स्थापना, वायन अर्पण, सोलह सुहागिन महिलाओं को भोजन एवं दक्षिणा देकर विधिपूर्वक उद्यापन किया जाता है।

Q8. क्या मंगला गौरी व्रत में आरती और व्रत कथा पढ़ना आवश्यक है ?

हाँ, पूजा के अंत में मंगला गौरी व्रत कथा का श्रवण तथा माता मंगला गौरी की आरती करना शुभ माना जाता है। इससे व्रत की पूजा पूर्ण मानी जाती है। ॥ जय माँ मंगला गौरी ॥

⚠️ डिसक्लेमर

इस लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, पंचांग, मान्यताओं या धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य केवल सूचना पहुंचाना है। इसके सही और सिद्ध होने की प्रामाणिकता नहीं दी जा सकती। कृपया किसी भी प्रकार के उपयोग से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।