लोहड़ी पर्व क्यों मनाते हैं लोहड़ी का पर्व ? कैसे पड़ा लोहड़ी नाम ? इतिहास, महत्व और कथा 

मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहडी पर्व मनाया जाता है, लोहडी पंजाब और सिख समुदाय के लोगों का मुख्य त्योहार है जिसके पिछे कई कहानियां प्रचलित हैं। मकर संक्रांति के दिन कंस ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए लोहिता नामक राक्षसी को गोकुल में भेजा था, जिसे श्री कृष्ण ने खेल-खेल में ही मार डाला था। इसी घटना की स्मृति में लोहिता का पावन पर्व मनाया जाता है। सिन्धी समाज में भी मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व लाल लाही के रूप में इस पर्व को मनाया जाता है। भारत के अलग-अलग प्रांतों में मकर संक्रांति के दिन या आसपास कई त्योहार मनाएं जाते हैं, जो कि मकर संक्रांति के ही दूसरे रूप है।

क्यों मनाते हैं लोहड़ी का पर्व ? Why celebrate the festival of Lohri in Hindi 

लोहड़ी मनाने के पीछे कई प्रचलित कथाएं भी हैं. लोहड़ी का पर्व माता सती, भगवान श्रीकृष्ण व दुल्ला भट्टी से जुड़ा हुआ माना गया है. इस दिन दुल्ला भट्टी वाला गीत गाने की परंपरा है. लोहड़ी पर अग्नि जलाई जाती है. सभी लोग इस पवित्र अग्नि की पूजा करते हैं. घर परिवार व रिश्तेदार सब लोग मिलकर लोहड़ी जलाते हैं. अग्नि में नई फसल, रेवड़ी, तिल, मूंगफली, गुड़ आदि डाले जाते हैं. वहीं, मेहमानों को लोहड़ी से संबंधित वस्तुएं वितरित की जाती हैं और लोहड़ी की बधाइयां देते हैं.

कैसे पड़ा लोहड़ी नाम ? 

पौष माह के अंतिम दिन रात्रि में लोहड़ी जलाने का विधान है. इस दिन के बाद प्रकृति में कई बदलाव आते हैं लोहड़ी की रात साल की सबसे लंबी रात होती है इसके बाद धीरे-धीरे दिन बड़े होने लगते हैं. मौसम फसलों के अनुकूल होने लगता है, इसलिए इसे मौसमी त्योहार भी कहा जाता है. लोहड़ी में ल से लकड़ी, ओह से गोहा (जलते हुए सूखे उपले) और ड़ी से रेवड़ी अर्थ होता है, इसलिए इस दिन मूंगफली, तिल, गुड़, गजक, चिड़वे, मक्के को लोहड़ी की आग पर से वारना करके खाने की परंपरा है.

लोहड़ी का धार्मिक महत्व

वैसे तो लोहड़ी का त्योहार प्रकृति की पूजा के लिए है. लेकिन पंजाब में इस पर्व का धार्मिक महत्व भी है. लोहड़ी की शाम को सात बार इसकी परिक्रमा की जाती है. साथ ही तिल, गुड़, चावल, मक्के की आहुति भी दी जाती है. जिसे तिलचौली कहते हैं. धार्मिक मान्यता ये है कि जिसके घर खुशियों का मौका आया हो, लोहड़ी उसी के घर जलाई जाएगी. इस अवसर पर लोग मिठाई बांटकर खुशियां मनाते है.

पौराणिक प्रचलित लोक कथा popular folk tale in Hindi 

लोहड़ी से संबद्ध परंपराओं एवं रीति-रिवाजों से ज्ञात होता है कि कई प्रागैतिहासिक गाथाएँ भी इससे जुड़ गई हैं। दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के योगाग्नि-दहन की याद में ही यह अग्नि जलाई जाती है।

इस पर्व के मनाये जाने के पीछे एक और प्रचलित लोक कथा भी है कि मकर संक्रांति के दिन कंस ने कृष्ण को मारने के लिए लोहिता नामक राक्षसी को गोकुल में भेजा था, जिसे कृष्ण ने खेल–खेल में ही मार डाला था। उसी घटना की स्मृति में लोहिता जिसे आगे जाकर लोहड़ी का नाम मिला का पावन पर्व मनाया जाता है।

लोहड़ी को दुल्ला भट्टी की एक कहानी से भी जोड़ा जाता हैं। दुल्ला भट्टी मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उसे पंजाब के नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था। उस समय संदल बार के जगह पर लड़कियों को ग़ुलामी के लिए बल पूर्वक अमीर लोगों को बेच जाता था जिसे दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को न केवल मुक्त ही करवाया बल्कि उनकी शादी भी हिन्दू लड़कों से करवाई और उनके शादी की सभी व्यवस्था भी करवाई। दुल्ला भट्टी एक विद्रोही था और जिसकी वंशावली भट्टी राजपूत थे। उसके पूर्वज पिंडी भट्टियों के शासक थे जो कि संदल बार में था। अब संदल बार पाकिस्तान में स्थित हैं। वह सभी पंजाबियों का नायक था।

लोहड़ी पर अग्नि का पूजन fire worship on lohri 

सूर्य ढलते ही खेतों में बड़े बड़े अलाव जलाए जाते हैं। घरों के सामने भी इसी प्रकार का दृश्य होता है। लोग ऊँची उठती अग्नि शिखाओं के चारों ओर एकत्रित होकर, अलाव की परिक्रमा करते हैं तथा अग्नि को पके हुए चावल, मक्का के दाने तथा अन्य चबाने वाले भोज्य पदार्थ अर्पित करते हैं। ‘आदर आए, दलिदर जाए’ इस प्रकार के गीत व लोकगीत इस पर्व पर गाए जाते हैं। यह एक प्रकार से अग्नि को समर्पित प्रार्थना है। जिसमें अग्नि भगवान से प्रचुरता व समृद्धि की कामना की जाती है।

परिक्रमा के बाद लोक मित्रों व सम्बन्धियों से मिलते हैं। शुभकामनाओं का आदान–प्रदान किया जाता है तथा आपस में भेंट बाँटी जाती है और प्रसाद वितरण भी होता है। प्रसाद में पाँच मुख्य वस्तुएँ होती हैं तिल, गजक, गुड़, मूँगफली तथा मक्का के दाने। शीतऋतु के विशेष भोज्य पदार्थ अलाव के चारों ओर बैठकर खाए जाते हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण व्यंजन है, मक्के की रोटी और सरसों का हरा साग।

लोहड़ी की संध्या पर होली की तरह लकड़ियाँ एकत्रित करके जलायी जाती हैं और तिलों से अग्नि का पूजन किया जाता है। इस त्योहार पर बच्चों के द्वारा घर–घर जाकर लकड़ियाँ एकत्र करने का ढंग बड़ा ही रोचक है। बच्चों की टोलियाँ लोहड़ी गाती हैं, और घर–घर से लकड़ियाँ माँगी जाती हैं। वे एक गीत गाते हैं, जो कि बहुत प्रसिद्ध है

सुंदर मुंदरिये ! ….हो

तेरा कौन बेचारा, ….हो

दुल्ला भट्टी वाला, ….हो

दुल्ले घी व्याही, …..हो

सेर शक्कर आई, ….हो

कुड़ी दे बाझे पाई, ….हो

कुड़ी दा लाल पटारा, ….हो

यह गीत गाकर दुल्ला भट्टी की याद करते हैं।

इस दिन सुबह से ही बच्चे घर–घर जाकर गीत गाते हैं तथा प्रत्येक घर से लोहड़ी माँगते हैं। यह कई रूपों में उन्हें प्रदान की जाती है। जैसे तिल, मूँगफली, गुड़, रेवड़ी व गजक। पंजाबी रॉबिन हुड दुल्ला भट्टी की प्रशंसा में गीत गाते हैं। दुल्ला भट्टी अमीरों को लूटकर, निर्धनों में धन बाँट देता था। एक बार उसने एक गाँव की निर्धन कन्या का विवाह स्वयं अपनी बहन के रूप में करवाया था।

लोहड़ी का त्योहार नवविवाहितों के लिए खास होता है. नव विवाहित जोड़ा इस दिन अग्नि में आहुति देते हुए उसके चारों ओर घूमता है और अपनी सुखी वैवाहिक जीवन की प्राथना करता है. माना जाता है कि ऐसा करने से दांपत्य जीवन में कोई परेशानी नहीं आती।

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