Som Pradosh vrat 2021: जेठ माह में सोमवार का विशेष महत्व, 7 जून को है सोम प्रदोष व्रत 

हिंदू-कैलेंडर का तीसरा माह भगवान विष्णु के लिए अति प्रिय होने के साथ ही भगवान शिव की पूजा के लिए भी विशेष माना गया है। इस दिन भगवान शिव की पूजा अति विशेष मानी गई है।

प्रदोष का दिन भगवान शिव को अति प्रिय माना गया है, इस दिन भगवान शिव की आराधना करने से निर्धन को धन, नि:सन्तान को सन्तान की प्राप्ति होती है । सोमवार के दिन आने वाले प्रदोष व्रत को सोम प्रदोष व्रत कहते हैं, यदि मन में हमेशा घबराहट बनी रहती हो और चित्त शांत ना रहता हो तो प्रति माह आने वाले भगवान शिव के इस कल्याणकारी व्रत को जरूर करना चाहिये। इस व्रत को करने वाले लोगों को जीवन में हार का सामना नहीं करना पड़ता, सोमवार के दिन आने वाले प्रदोष व्रत को सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला माना गया है ।

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हिंदू पंचांग के मुताबिक़, जून माह का पहला प्रदोष व्रत ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी 7 जून को सुबह 08 बजकर 48 मिनट से शुरू होकर 08 जून 2021 दिन मंगलवार को सुबह 11 बजकर 24 मिनट तक रहेगी. प्रदोष काल सूर्यास्त के 45 मिनट पहले और सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक होता है.

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पौराणिक व्रत कथा

सोम प्रदोष व्रत की पौराणिक व्रतकथा के अनुसार एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति का स्वर्गवास हो गया था। उसका अब कोई आश्रयदाता नहीं था इसलिए प्रात: होते ही वह अपने पुत्र के साथ भीख मांगने निकल पड़ती थी। भिक्षाटन से ही वह स्वयं व पुत्र का पेट पालती थी।

एक दिन ब्राह्मणी घर लौट रही थी तो उसे एक लड़का घायल अवस्था में कराहता हुआ मिला। ब्राह्मणी दयावश उसे अपने घर ले आई। वह लड़का विदर्भ का राजकुमार था। शत्रु सैनिकों ने उसके राज्य पर आक्रमण कर उसके पिता को बंदी बना लिया था और राज्य पर नियंत्रण कर लिया था इसलिए वह मारा-मारा फिर रहा था। राजकुमार ब्राह्मण-पुत्र के साथ ब्राह्मणी के घर रहने लगा।

एक दिन अंशुमति नामक एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा तो वह उस पर मोहित हो गई। अगले दिन अंशुमति अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलाने लाई। उन्हें भी राजकुमार भा गया।

कुछ दिनों बाद अंशुमति के माता-पिता को शंकर भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया कि राजकुमार और अंशुमति का विवाह कर दिया जाए। उन्होंने वैसा ही किया।

ब्राह्मणी प्रदोष व्रत करती थी। उसके व्रत के प्रभाव और गंधर्वराज की सेना की सहायता से राजकुमार ने विदर्भ से शत्रुओं को खदेड़ दिया और पिता के राज्य को पुन: प्राप्त कर आनंदपूर्वक रहने लगा।

राजकुमार ने ब्राह्मण-पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया। ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के महात्म्य से जैसे राजकुमार और ब्राह्मण-पुत्र के दिन फिरे, वैसे ही शंकर भगवान अपने दूसरे भक्तों के दिन भी फेरते हैं। अत: सोम प्रदोष का व्रत करने वाले सभी भक्तों को यह कथा अवश्य पढ़नी अथवा सुननी चाहिए।

सोम प्रदोष व्रत का महत्व

सोम प्रदोष में भगवान शिव का अभिषेक रुद्राभिषेक और उनका श्रृंगार करने का बहुत ही महत्व है। सोम प्रदोष वाले दिन महादेव की पूजा अर्चना से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। लड़का या लड़की की शादी-विवाह की अड़चनें दूर होती है। संतान की इच्छा रखने वाले लोगों को इस दिन पंचगव्य से महादेव का अभिषेक करना चाहिए। जिन्हें लक्ष्मी प्राप्ति और कारोबार मे सफलता की कामना हो, उन्हें दूध से अभिषेक करने के बाद शिवलिंग पर फूलों की माला अर्पित करनी चाहिए। इस पूजा से उन्हें प्रत्येक काम में सफलता प्राप्त होगी।

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पूजन विधि

सोम प्रदोष के दिन प्रात:काल नित्य कर्म से निवृत्त होकर बेलपत्र, गंगाजल, अक्षत, धूप, दीप आदि चढ़ाकर शिवजी का पूजन करना चाहिए।

सोम प्रदोष के पूरे दिन निराहार रहें।

पूरे दिन ‘ॐ नम: शिवाय’ मंत्र का मन ही मन अधिक से अधिक जप करें।

सोम प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4.30 से लेकर 7.00 बजे के बीच की जाती है।

त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सूर्यास्त से 3 घड़ी पूर्व शिवजी का पूजन करना चाहिए।

व्रतधारी को चाहिए कि पूजन से पहले शाम को दुबारा स्नान कर स्वच्छ सफेद वस्त्र धारण करें।

पूजा स्थान को शुद्ध करें।

अगर घर में उचित व्यवस्था ना हो तो व्रतधारी शिव मंदिर जाकर भी पूजा कर सकते हैं।

पांच रंगों से रंगोली बनाकर मंडप तैयार करें।

पूजन की सभी सामग्री एकत्रित करें।

कलश अथवा लोटे में शुद्ध जल भरकर रख लें।

कुश के आसन पर बैठकर शिवजी की पूजा विधि-विधान से करें।

मंत्र- ‘ॐ नम: शिवाय’ कहते हुए शिवजी को जल अर्पित करें।

इसके बाद दोनों हाथ जो‌ड़कर शिवजी का ध्यान करें।

शिवजी का ध्यान करते समय उनके इस स्वरूप का ध्यान धरें-

त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर चंद्रमा का आभूषण धारण करने वाले पिंगल वर्ण के जटाजूटधारी, करोड़ों चंद्रमा के समान कांतिवान, नीले कंठ तथा अनेक रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित, रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान, वरदहस्त, त्रिशूलधारी, नागों के कुंडल पहने, व्याघ्र चर्म धारण किए हुए भगवान शिव हमारे सारे कष्टों को दूर कर सुख-समृद्धि प्रदान करें।

इस प्रकार ध्यानमग्न होकर सोम प्रदोष व्रत की कथा सुनें अथवा सुनाएं।

कथा समाप्ति के बाद हवन सामग्री मिलाकर ‘ॐ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा’ मंत्र से 11 या 21 या 108 बार आहुति दें।

तत्पश्चात शिवजी की आरती करें तथा प्रसाद वितरित करके भोजन ग्रहण करें।

व्रत करने वाले व्यक्ति को कम-से-कम 11 अथवा 26 त्रयोदशी व्रत के बाद उद्यापन करना चाहिए।

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प्रदोषस्तोत्राष्टकम्

यह प्रदोष स्तोत्र स्कान्द पुराण के अन्तर्गतम् से लिया गया हैं ! प्रदोष स्तोत्र पढ़ने से भगवान शिव जी की कृपा सदैव आप पर बनी रहती है ! प्रदोष व्रत में प्रदोष स्तोत्र का पाठ करना बेहद लाभदायक होता है।

॥ प्रदोषस्तोत्रम् ॥

 श्री गणेशाय नमः ।

जय देव जगन्नाथ जय शङ्कर शाश्वत । जय सर्वसुराध्यक्ष जय सर्वसुरार्चित ॥ १॥

जय सर्वगुणातीत जय सर्ववरप्रद । जय नित्य निराधार जय विश्वम्भराव्यय ॥ २॥

जय विश्वैकवन्द्येश जय नागेन्द्रभूषण । जय गौरीपते शम्भो जय चन्द्रार्धशेखर ॥ ३॥

जय कोट्यर्कसङ्काश जयानन्तगुणाश्रय । जय भद्र विरूपाक्ष जयाचिन्त्य निरञ्जन ॥ ४॥

जय नाथ कृपासिन्धो जय भक्तार्तिभञ्जन । जय दुस्तरसंसारसागरोत्तारण प्रभो ॥ ५॥

प्रसीद मे महादेव संसारार्तस्य खिद्यतः । सर्वपापक्षयं कृत्वा रक्ष मां परमेश्वर ॥ ६॥

महादारिद्र्यमग्नस्य महापापहतस्य च । महाशोकनिविष्टस्य महारोगातुरस्य च ॥ ७॥

ऋणभारपरीतस्य दह्यमानस्य कर्मभिः । ग्रहैः प्रपीड्यमानस्य प्रसीद मम शङ्कर ॥ ८॥

दरिद्रः प्रार्थयेद्देवं प्रदोषे गिरिजापतिम् । अर्थाढ्यो वाऽथ राजा वा प्रार्थयेद्देवमीश्वरम् ॥ ९॥

दीर्घमायुः सदारोग्यं कोशवृद्धिर्बलोन्नतिः । ममास्तु नित्यमानन्दः प्रसादात्तव शङ्कर ॥ १०॥

शत्रवः संक्षयं यान्तु प्रसीदन्तु मम प्रजाः । नश्यन्तु दस्यवो राष्ट्रे जनाः सन्तु निरापदः ॥ ११॥

दुर्भिक्षमरिसन्तापाः शमं यान्तु महीतले । सर्वसस्यसमृद्धिश्च भूयात्सुखमया दिशः ॥ १२॥

एवमाराधयेद्देवं पूजान्ते गिरिजापतिम् । ब्राह्मणान्भोजयेत् पश्चाद्दक्षिणाभिश्च पूजयेत् ॥ १३॥

सर्वपापक्षयकरी सर्वरोगनिवारणी । शिवपूजा मयाऽऽख्याता सर्वाभीष्टफलप्रदा ॥ १४॥

॥ इति प्रदोषस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

प्रातः काल या प्रदोष काल में इसका पाठ करना सर्वोत्तम होता है।

नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय।

नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे न काराय नम: शिवाय:।।

प्रेम से बोलिये ॐ नमः शिवाय

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